साझी धूप का सफ़र
मोहब्बत मेरे दिल में यूँ उतरती चली आई, कि जैसे सूखी मिट्टी में कोई बारिश समाई। किसी ने दिल को सिखलाया नहीं अपना बना लेना, कली ख़ुद सीख जाती है बहारों में हँसा देना। // शादी कोई रंगीं ख़्वाब या बस इश्क़ का दरिया नहीं, ये साधारण से लम्हों में छुपा गहरा फ़लसफ़ा सही। दो अधूरे लोग मिलकर यूँ सफ़र करना भी सीखें, कि मुकम्मल होने से बढ़कर किसी का साथ ही देखें। // नदियाँ जाकर समंदर में भले पहचान खो दें सब, मगर उनके वजूदों का कहीं रिश्ता नहीं जाता अब। इसी तरह दो रूहें भी विवाहों में उतरती हैं, अलग रहकर भी धीरे-धीरे इक धड़कन-सी लगती हैं। // गर्मियों की धूप शहरों पर थकन बनकर उतरती है, हवा भी जैसे चिड़चिड़े किसी इंसाँ-सी लगती है। उसी मौसम में वो बच्चों को लेकर घर से जाती है, मिरी दुनिया की हर रौनक भी संग अपने ले जाती है। // अचानक घर की दीवारें मुझे बातें सुनाती हैं, ख़मोशी की कई तहें मुझे जीना सिखाती हैं। सुबह जब ख़ुद ही उठकर मैं अकेला चाय पीता हूँ, बर्तनों की उस ख़मोशी में तिरा होना ही जीता हूँ। // तभी ए...