एक ही आकाश तले


 रेखाओं में जग देखा मैंने,

काले-सफ़ेद सख़्त सपने।

अंधियारा और उजियारा,

बँटा रहा मन का गुज़ारा।


भय ने बाँधा जीवन सारा,

साझी धरती, राहें न्यारा।

पर फिर देखा सत्य अधूरा,

क्षण-क्षण बीते, समय न दूना।


हम चिंगारी क्षणिक प्रकाश,

सपनों से भरते इतिहास।

सितारों जैसे जलकर खोते,

धूल उसी की सब संजोते।


तो क्यों दीवारें खड़ी करें?

जाति-धर्म के बीज धरें?

जब अंत सभी मिट्टी बन जाते,

एक ही छंद में लौटे आते।


हम सब प्रेमजन्मे प्राणी,

एक गगन की छाँव सयानी।

रेखाएँ सब छोड़ चलें हम,

दिल में पाएँ सच्चा घर हम।


क्षणिक जीवन का यही संदेश,

आलिंगन है सच्चा परिवेश।

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