साझी धूप का सफ़र

 


मोहब्बत मेरे दिल में यूँ उतरती चली आई, 

कि जैसे सूखी मिट्टी में कोई बारिश समाई। 

किसी ने दिल को सिखलाया नहीं अपना बना लेना, 

कली ख़ुद सीख जाती है बहारों में हँसा देना।

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शादी कोई रंगीं ख़्वाब या बस इश्क़ का दरिया नहीं,

 ये साधारण से लम्हों में छुपा गहरा फ़लसफ़ा सही। 

दो अधूरे लोग मिलकर यूँ सफ़र करना भी सीखें, 

कि मुकम्मल होने से बढ़कर किसी का साथ ही देखें।

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नदियाँ जाकर समंदर में भले पहचान खो दें सब, 

मगर उनके वजूदों का कहीं रिश्ता नहीं जाता अब। 

इसी तरह दो रूहें भी विवाहों में उतरती हैं, 

अलग रहकर भी धीरे-धीरे इक धड़कन-सी लगती हैं।

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गर्मियों की धूप शहरों पर थकन बनकर उतरती है,

 हवा भी जैसे चिड़चिड़े किसी इंसाँ-सी लगती है। 

उसी मौसम में वो बच्चों को लेकर घर से जाती है, 

मिरी दुनिया की हर रौनक भी संग अपने ले जाती है।

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अचानक घर की दीवारें मुझे बातें सुनाती हैं, 

ख़मोशी की कई तहें मुझे जीना सिखाती हैं। 

सुबह जब ख़ुद ही उठकर मैं अकेला चाय पीता हूँ, 

बर्तनों की उस ख़मोशी में तिरा होना ही जीता हूँ।

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तभी एहसास ये होता मोहब्बत शोर में कम है, 

ये छोटी-छोटी आदत में छुपा रहता कोई मरहम है।

 मैं ऑफ़िस से थका-माँदा जो घर का ताला खोलूँ तो, 

कोई आवाज़ ये पूछे नहीं - दिन कैसा है तुम?

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उसी पल एक तन्हाई मिरे पहलू में आ बैठी, 

पुराने साए जैसी वो मिरे अंदर कहीं बैठी। 

मनोवैज्ञानिकों ने भी यही समझाया दुनिया को, 

कि दिल को चैन मिलता है किसी अपने की छाया को।

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इसी कारण ये ख़ाली घर बहुत भारी-सा लगता है,

 कभी-कभी बोझ मेहनत से भी बढ़कर-सा लगता है। 

वो औरत जिसकी आदत से कभी झुँझलाहटें थीं कुछ, 

जिसे सुनकर कभी थकते मिरे सब्रों के मौसम भी।

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उसी की ग़ैरमौजूदगी मुझे ये आज कहती है, 

मिरी रूह उसके सहारे ही कई बरसों से रहती है। 

मैं उसको फ़ोन करके बस यही हर बार कहता हूँ, 

"भला तुम लोग वापस अब हमारे घर कब आते हो?"

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उसी लम्हे मुझे मालूम होता प्यार क्या शय है, 

जुदाई ही बताती है मोहब्बत किस क़दर गहरी है। 

मैं अपने आप से कहता अब कम ग़ुस्सा किया होगा, 

ज़रा नरमी से बोलूँगा, ज़रा सब्रों को जिया होगा।

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अजब नैतिकता रखती है ये थोड़ी-सी जुदाई भी, 

ग़ुरूरों को पिघलाकर बना देती है रुसवाई भी। 

मगर जब लौटकर फिर से वो बच्चे साथ लाती है, 

मिरी सूनी हुई दुनिया अचानक मुस्कुराती है।


खिलौने फ़र्श पर बिखरे, वही आवाज़, वही बातें, 

मिरी लापरवाही पर वही शिकवे, वही रातें। 

मगर उस शोर के नीचे बड़ा सुकून रहता है, 

सी अपने के होने से ही घर आबाद रहता है।

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शादी का अर्थ हरगिज़ ये नहीं ख़ामोशियाँ हों बस, 

ये इक-दूजे की मौजूदगी से मिलने वाला मरहम। 

अरस्तू ने कहा इंसाँ अकेला जी नहीं सकता, 

वो रिश्तों की हरारत के बिना खिल ही नहीं सकता।

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शायद शादी ही इस सच्चाई को बेहतर बताती है, 

किताबों से कहीं बढ़कर ये दुनिया को सिखाती है। 

शुरू-शुरू में उसकी दूरियों पर जश्न होता है, 

मिरे दोस्तों के संग देर तक क़हक़हा होता है।

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मुझे लगता है जैसे फिर जवानी लौट आई है, 

किसी पिंजरे से उड़ने की नई राहत भी पाई है। 

मगर ये आज़ादी भी अकेली हो तो चुभती है, 

बिना अपनापन के हर ख़ुशी आख़िर कहाँ टिकती है।

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अजब दिल है - कभी दूरी, कभी नज़दीकियाँ चाहे, 

मिले तो फ़ासले ढूँढे, जुदा हो तो वही चाहे। 

शादी शायद इसी संतुलन का सबसे सच्चा चेहरा है, 

जहाँ हर रोज़ का झगड़ा भी मोहब्बत का ही पहरा है।

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हर इक तकरार अंदर से हमें थोड़ा सँभालती है, 

माफ़ी की नरम बारिश से अना भी धुल-सी जाती है। 

मैंने समझा कि सच्चा प्यार कोई शोर करता ही नहीं, 

ये फ़िल्मी इश्क़ जैसा तेज़ या मशहूर होता ही नहीं।

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ये चुपके से गुज़रता है फ़िक्रों और इंतज़ारों में, 

किसी के लौट आने की दुआओं और बहारों में।

 मोहब्बत है -तिरा पूछो कि खाना ठीक से खाया? 

मोहब्बत है - मिरे आगे तिरा थकना भी छुप पाया।

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तू अपने दर्द छुपाकर सभी चेहरों को हँसाती है, 

मिरी दुनिया की हर धड़कन को चुपके से बचाती है। 

बरस बीतें तो बालों में सफ़ेदी उतर आती है, 

मिरी रफ़्तार भी धीरे-धीरे कम नज़र आती है।

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मगर हैरान हूँ -वक़्त मोहब्बत को मिटाता कब, 

ये सोने को तपाकर और ज़्यादा ख़ूबसूरत कर। 

जो रिश्ता सिर्फ़ चाहत और कशिश से शुरू होता था, 

वही रूहों की गहराई में जाकर घर बनाता था।

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अब हमारी मोहब्बत की ज़ुबाँ बेहद ही नर्म हुई, 

"दवा तुम वक़्त पर लेना" - यही सबसे बड़ी ख़ुशबू हुई। 

"बिना छतरी के मत जाना, अभी बारिश भी होगी शायद,

" यही छोटे से जुमले अब मोहब्बत की गवाही हैं।

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फिर इक दिन बच्चे भी अपनी दुनिया में चले जाते, 

पुराने घर की चौखट पर कई सन्नाटे रह जाते। 

किसी शाम हम दोनों बस यूँ ही ख़ामोश बैठें तो, 

ढलती धूप खिड़की से उतरती देर तक दिखती हो।

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न बातें ज़्यादा होती हैं, न कोई शोर रहता है, 

मगर उस मौन में रिश्ता बहुत गहरा-सा बहता है। 

जो रूहें उम्र भर मिलकर ज़माने का सफ़र काटें,

 वो आख़िर ख़ामोशी में भी कई अर्थों को पढ़ पातीं।

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अब ऐसा लगता शादी बस किसी पर हक़ जताना नहीं, 

न कुर्बानी, न हुक्मों से किसी को बाँध पाना ही। 

ये हर दिन एक नैतिक-सा नया निर्णय सुनाती है, 

किसी धड़कते हुए दिल की हिफ़ाज़त को निभाती है।

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हम ऐसे दो दरख़्तों जैसे साथों-साथ बढ़ते हों, 

हवाओं में अलग झुकते मगर जड़ों से जुड़े हों।

 तूफ़ानों ने हमें मोड़ा मगर तोड़ा नहीं अब तक,

ज़मीं के नीचे रिश्तों का सफ़र गहरा हुआ अब तक।

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शायद मोहब्बतों का आख़िरी मतलब यही निकले,

 जो तुमको जान ले पूरा वही सबसे क़रीब निकले। 

तुम्हारी हर कमी जानकर भी जो पास रह पाए, 

थकी रूहों को दुनिया में वही सबसे सुरक्षित पाए।

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इसी कारण वो जब कुछ रोज़ को घर से निकलती है,

 मैं आज़ादी के एहसासों में थोड़ी देर हँसता हूँ। 

मगर दिल जानता है घर मुकम्मल तब ही लगता है,

जब उसकी आहटों से फिर ये सूना घर भी भरता है।

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