ज़ंजीरों का विनाश: मानवता का आह्वान


अछूत — वे शरीर में नहीं,

वे मन के अंधकार में बसे हैं,

घृणा की परछाई हैं,

डर की झूठी मूर्ति हैं।  


हम यहाँ हैं —

इस विषाक्तता को जड़ से उखाड़ फेंकने,

इस झूठी मान्यता को जला डालने,

जो कहती है कि खून का रंग अलग है।  


रंगभेद एक जोंक है —

अज्ञान के खून से फटती,

चुप्पी के दलदल में फँसी,

विषैली जंजीरों जैसी जकड़ी।  


जाति एक सड़ता हुआ शव है —

जिसे परंपरा की कायरता ने जकड़ा है,

जीवन के हर रंग को रौंदने वाली,

वह विषाक्त शव, जो कभी न मरता।  


हम तुम्हारी झूठी ऊँच-नीच को नहीं मानेंगे,

हम तुम्हारे भेदभाव को अपनी खामोशी से स्वीकार नहीं करेंगे।

तुम्हारी श्रेष्ठता एक छलावा है,

तुम्हारी पवित्रता — बस धूल और धोखा।  


गली से संसद तक,

मंदिर से अदालत तक,

हम हर दीवार को गिराएँगे,

जो नफ़रत की ईंटों से बनी है।  


हम इंसानियत को टुकड़ों में बाँटने वाले

तुम्हारे नकली विज्ञान को खारिज करते हैं।

हम तुम्हारे बर्बर पैमानों को नकारते हैं।

हम ऐलान करते हैं —

हर रंग, हर वंश,

अभिन्न है, पवित्र है, अजेय है।  


सुन लो —

कोई भगवान तुम्हारे अन्याय का समर्थन नहीं करता।

कोई शास्त्र तुम्हारी बेड़ियों को पवित्र नहीं कहता।

कोई राष्ट्र, बहिष्कृतों की हड्डियों पर नहीं फलता।  


जब तक तुम्हारा पूर्वाग्रह खत्म नहीं होता,

हम तब तक लड़ेंगे,

जब तक हर आस्था, हर संकल्प,

सत्य के प्रकाश में न जल जाए।  


यह जंग है मानवता की,

यह युद्ध है प्रेम और न्याय का,

यह प्रण है, कि

ज़ंजीरों का अंत,

आज़ादी का सूर्य उदित होगा।  


यह कविता है एक संघर्ष की पुकार—

एक चेतावनी, एक उम्मीद,

एक संकल्प, जो हर दिल में धड़कता रहे।

क्योंकि जब तक जाति, रंग और वंश की बेड़ियाँ टूटेंगी नहीं,

तब तक मानवता का सूरज नहीं उगेगा।  

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