पिंजरा तोड़ दो
प्यारी बेटियों, उन नियमों को तोड़ दो
जिन्होंने तुम्हारे पंखों को डर सिखाया,
तुम पैदा नहीं हुई चुपचाप सहने के लिए,
न ही घुट-घुटकर मिट जाने के लिए।
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उस नियम को तोड़ दो जो दर्द छिपाए,
और चुप्पी को गरिमा का नाम दे,
तुम्हारे भीतर की काँपती आवाज़
दबने नहीं, ऊपर उठने के लिए है।
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उस सोच को भी अब तोड़ डालो
जो तुम्हारी कीमत रिश्तों से आँके,
कोई पवित्र धागा इतना बड़ा नहीं
जितनी बड़ी तुम्हारी जीवित आत्मा है।
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तुम्हारे हाथ सिर्फ़ बोझ उठाने
या आँसुओं के घड़े ढोने को नहीं बने,
किस्मत कहकर दुख सहते रहना
तुम्हारी नियति कभी नहीं थी।
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तुम पर कोई कर्ज़ नहीं उन लोगों का
जो डर के कारण वहीं ठहर गए,
तुम्हारी पहली वफ़ादारी उसकी है
जो लड़की अब भी भीतर जीवित है।
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खुद को आज़ाद करना लौटना है
अपने ही पेड़ की हर टूटी डाल तक,
और काट देना उन रस्सियों को
जिनसे पीढ़ियों की औरतें बँधी रहीं।
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तुम पैदा नहीं हुई उन लोगों के लिए
जो तुम्हारी रोशनी छीन लेते हैं,
जो घर तुम्हें भीतर से तोड़ दे
वह रहने के योग्य घर नहीं।
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अगर प्रेम काँटों का पिंजरा बन जाए
तो अपनी रूह के मुरझाने से पहले निकलो,
किसी स्त्री से यह उम्मीद न हो
कि वह शर्म की जेल में खिलती रहे।
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जिस दिन तुम खुद को चुन लोगी
वे तुम्हें मुश्किल और कठोर कहेंगे,
क्योंकि निडर औरतें अक्सर
डर पर बने साम्राज्य हिला देती हैं।
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उन्होंने हमेशा उन्हीं बेटियों को सराहा
जो बिना आवाज़ किए दुख सहती रहीं,
लेकिन हर बहादुर औरत से डरते रहे
जो अपने ज़ख्मों के साथ खड़ी रही।
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वे चाहेंगे तुम इतनी नरम बनो
कि आसानी से मोड़ी जा सको,
पर खुद को इतना मत घिसने देना
कि तुम्हारी सारी धार खो जाए।
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एक सताई हुई बेटी सबको सुकून देती,
समाज को गहरी नींद में रखती है,
लेकिन जो दर्द से दूर चली जाए
वह दबी हुई सच्चाइयाँ जगा देती है।
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क्यों बचाना ऐसा रिश्ता
जो हर दिन तुम्हें थोड़ा मारता हो,
एक औरत का यही सवाल
सदियों की सत्ता हिला देता है।
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प्यारी बेटियों, अब चुप्पी का बोझ
अपने कंधों से उतार फेंको,
उन सीमाओं को पार कर जाओ
जो डर ने तुम्हारे चारों ओर खींचीं।
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जिस दिन कोई स्त्री सिर उठाकर
अपने दर्द के लिए माफ़ी माँगना छोड़ दे,
उसी दिन सत्ता की दीवारों में
धीरे-धीरे दरारें पड़ने लगती हैं।
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तो उन नियमों को पूरी तरह तोड़ दो
जिन्होंने तुम्हें कैद कर रखा था,
आज़ादी चुनो चाहे राह कठिन हो,
इतिहास तुम्हें साहसी कहकर याद रखेगा।

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