नया औज़ार (Rewrite free lines)
मैं राख बटोर कर गुफा की दीवारों पर लकीरें खींचता रहा,
हथौड़े और छेनी से ज़िंदगी को बेरहमी से पीसता रहा।
हाथों की दरारें लहू से भर गईं, पर मुझे गुमान था-
कि दर्द ही बस कला है, और संघर्ष ही बस ज्ञान था।
//
तभी कुछ लोग आए, जिनके हाथों में रोशनी और फौलाद थे,
वो बिजली से बातें करते थे, वो मशीनों के उस्ताद थे।
मैंने अपनी सदियों की मेहनत से जो एक साया भी न ढाला था,
उन्होंने पलक झपकते ही एक नया पहाड़ तराश डाला था।
//
मेरी आँखें जलन से भर गईं, मैंने उनके हुनर को कोसा,
कहा-"ये कला नहीं, ये धोखा है, मशीनी चाल है सिर्फ, भरोसा न करना!"
कहा-"इन लोहे के टुकड़ों में भला कहाँ कोई रूह होती है?
बिना दर्द के जो पैदा हो, वो कला भी क्या अछूती होती है?"
//
पर तभी एक अंदरूनी चीख उठी, जैसे हड्डी पर लोहा लगा,
एक ख्याल की छेनी चली, और मेरा भरम का महल ढहने लगा।
हवा ने मेरे कानों में फूँका: "तुम इस ज़िद को ज्ञान कह रहे हो?
तुम बहते समंदर के आगे, एक टूटे कुएँ में सड़ रहे हो!"
//
तब खुली आँखें, और समझ आया कि-
मशीन चाहे कितना भी बड़ा पहाड़ काट दे,
पर उस मूर्ति का पहला नक्शा किसने सोचा था?
लोहा भले ही हाथ का इशारा मान ले,
पर उस रचना का ख़्वाब किसने देखा था?
//
कोई औज़ार सोच पैदा नहीं कर सकता,
कोई कंप्यूटर जज़्बात नहीं लिख सकता।
एक खाली दिमाग कभी कलाकार नहीं बन सकता,
चाहे उसे मशीनों के महल में ही क्यों न बैठा दिया जाए।
//
ये एआई (AI) रात की तन्हाई का दर्द नहीं जानती,
ये बचपन के छिले हुए घुटनों का वो ज़ख्म नहीं मानती।
सितारों के ढलने पर इसके सीने में कोई टीस नहीं उठती,
हमारी अधूरी ख्वाहिशों की तड़प इसे समझ नहीं आती।
//
वो ज़ख्म हमारा है, वो आग हमारी है,
मशीनें तो सिर्फ उस सोच की आज्ञाकारी हैं।
तनाव, सन्नाटा और तड़प- इंसानी रूह का हिस्सा हैं,
ये लोहे के पुर्जे तो बस उस कहानी को लिखने का ज़रिया हैं।
//
जो किसान पुरानी, ज़ंग लगी दरांती को पकड़ कर रोता रहेगा,
वो बदलते मौसम के आगे अपनी फसल हमेशा खोता रहेगा।
मूर्ख अपनी पुरानी ज़ंजीरों को ही अपनी विरासत मान लेते हैं,
पर समझदार वक्त के साथ नए औज़ार थाम लेते हैं।
//
दूरबीन ने कभी आसमान को ख़त्म नहीं किया,
और जहाज़ ने कभी खोजी की आँखों को अंधा नहीं किया।
औज़ार रूह की प्रतिभा को मिटाते नहीं,
वो तो बस सपनों को एक बड़ा आसमान दे जाते हैं।
//
तो जागो, ओ कुएँ के मेंढकों! जो अहंकार की नींद सो रहे हो,
वक़्त बदल चुका है, और तुम पुरानी राख को लेकर रो रहे हो।
गुफाओं के उन धुंधले सायों से बाहर कदम बढ़ाओ,
इस कड़कती बिजली को थामो, और नए युग का हिस्सा बन जाओ।
//
मैंने अपने जख्मी हाथों से वो पुरानी राख धो डाली,
और इस नए ज़माने की चमकती रोशनी थाम ली।
क्योंकि-
जो वक़्त के साथ चलना सीखता है, वही अपना भाग्य बनाता है,
और जो नए औज़ारों से डरता है, वो इतिहास की धूल में खो जाता है।

Comments
Post a Comment