औज़ार

 


मैं गुफाओं की काली दीवारों पर

कोयले से सपने लिखता था,

उँगलियों से खून टपकता था

और मैं उसे ही कला समझता था।


मैंने छालों को सम्मान कहा,

दर्द को अपना धर्म बनाया,

टूटे हथौड़ों की आवाज़ों में

जीवन का संगीत सुन पाया।


फिर बिजली बुनने वाले आए,

काँच से बातें करने वाले,

क्षण भर में संसार रच देते—

रोशनी के नए उजाले।


मैं पत्थर घिसता रह जाता,

वे आकाश तराश के लाते,

मैंने जलन में हँसकर बोला—

“ये कलाकार नहीं कहलाते।”


“ये सब मशीनों की चालें हैं,

इनमें न आत्मा, न गहराई।”

जैसे बाँसुरी खुद गाती हो,

जैसे कलम स्वयं लिख पाई।


तब हवा दरारों से बोली—

“तू पीड़ा को पूजा समझे,

औज़ारों के बोझ तले ही

अपने सपनों को कुचले।”


“क्या नाव बुरी हो जाती है

क्योंकि चप्पू तेज़ चलाते?

क्या सूरज कम सुंदर होता

यदि प्रकाश तुरंत आ जाते?”


सच बिजली बनकर गिरा तब,

मन की गुफाएँ टूट गईं,

जो दुनिया मैंने पकड़ी थी

वो मुट्ठी से ही छूट गई।


कोयले का वह युग गया अब,

स्याही वाले दिन भी बीते,

अब विचारों की गति लेकर

कृत्रिम बुद्धि के युग जीते।


पर सुन लो ऐ ज्ञान के रक्षक,

जो खुद को बुद्धिजीवी कहते—

AI केवल औज़ार है बस,

विचार मनुष्य के ही रहते।


AI को न दर्द समझ आता,

न आधी रातों का रोना,

न बरसातों में खो जाना,

न स्मृतियों में चुपचाप होना।


वो केवल आदेश सुनता है,

जैसे खाली पड़ी हथौड़ी,

अर्थ तभी जन्म लेते हैं

जब मानव चेतना जोड़ी।


कल कोयला हाथों में था,

फिर कलमों ने राज किया,

अब बिजली की उँगली पकड़

मानव ने आकाश लिया।


मूर्ख वही जो नाव जलाकर

किनारों से प्रेम निभाए,

ज्ञानी वो जो समय समझकर

नए समंदर पार कराए।


जीवन को सही औज़ारों की

हर युग में आवश्यकता है,

नंगे हाथों से तूफ़ानों से

लड़ना केवल मूर्खता है।


लक्ष्य वही पर्वत की चोटी,

बस राहों का रूप नया है,

जो बदल सके समय के संग

भविष्य उसी का हुआ है।


उठो पुराने कुओं से अब,

डर की दीवारें तोड़ो,

पत्थर युग की जिद छोड़कर

बिजली के युग से जोड़ो।


मैंने भी कोयला धो डाला,

घावों की पूजा छोड़ दी,

फिर बिजली की रोशनी पकड़

सितारों से रचना जोड़ दी।

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