भारी बूंद


मैं जब महसूस करता हूँ,

तो गले में दर्द उठता है,

आँसुओं की कतार इतनी लंबी कि

वह खामोशी को भी तोड़ देती है।


मैं चाहता हूँ कि रो लूँ,

बस एक बार बाहर निकाल दूँ,

दिल का बोझ थोड़ा हल्का हो जाए।

मगर जानता हूँ-

कुछ भी बदल नहीं सकता,

वही दर्द वहीं रह जाता है,

शायद और भी गहरा।


कभी-कभी,

एक छोटी-सी आँसू की बूंद फिसल जाती है,

जैसे कोई चुपके से कहता हो,

"मैं यहाँ हूँ… तुम्हारे दर्द का हिस्सा।"

वह हल्का सा संकेत है,

एक छोटा, नमकीन मोती-

जो राहत तो नहीं,

बस एक नन्ही-सी उम्मीद की डोर है।


वह बूंद,

शायद आकार में छोटी,

लेकिन उसकी यात्रा इतनी भारी,

जैसे हर आँसू में छिपी हो एक दुनिया

जो कहती है-"अभी भी कुछ है, जिसे जीना है।"


और मैं जानता हूँ,

यह बूंद भी भारी है,

क्योंकि यह दिखाती है कि

मेरा दर्द अभी भी जिंदा है,

और मैं अब भी महसूस करता हूँ

वह धड़कन-

जो कभी खत्म नहीं होती।


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