छोड़ दो

 

वही मैं था, जो इंतजार करता रहा—

इंद्रधनुष के पीछे छुपा सूरज,

मेरा मन, एक टूटा हुआ आकाश जैसे,

जहां दुख ने अपनी छाप छोड़ी चेहरे पर।  


मैं जलता रहा, अनजान की आग में,

खो गया अपने ही अंदर, कोई ठिकाना न मिला।

जीवन के सूखे फूलों से चुभा,

बनी मैं कविता, बारिश की धूल में।  


मेरे शब्द अनकहे, फंसे गले में,

आँसू बन गए उलटे दृश्य, खामोशी की चादर तले।

वह सपना, जिसे मैं छोड़ आया था,

वहीं लौट आया, जहां मैं मर चुका था—

विचारों की राख, ध्वनि की ज्वाला, और आग का संगम,

जहां अव्यवस्था गुनगुनाती, नाम पुकारती।  


मैं हर छाया में भटका,

सच को छुपाता रहा, पूछने का साहस न कर सका।

फिर धीरे-धीरे, रात की सीमा से,

एक परदा हिला, मंद प्रकाश की ओर।  


विचारों की इस ज्वाला में, जो कभी निराश थी,

दो शब्द उभरे, सौम्य और चमकदार:

“छोड़ दो।” और उस शांति की सांस में,

मैं मृत्यु के पार उठ खड़ा हुआ।  


आग, मौन, और अंततः— मैं मुक्त हो गया—

मुक्ति का वह उपहार: जीवन की इच्छा।

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