अनंत प्रेम




मन की नीरव गहराइयों में,

एक तड़प है, एक मधुर पीड़ा।

उसके होने की चाह लिए,

सपनों में झिलमिलती क्रीड़ा।


बिन प्रेम के जीवन सूना,

रंगहीन, जैसे टूटा सपना।

उसके बिना हर क्षण अधूरा,

दिन भी शीतल, रात भी तन्हा।


उसके स्पर्श की लालसा,

रेत में जैसे अमृत-धारा।

उसकी साँसों की गूंज सुनूँ,

डर मिट जाए, जीवन सँवारा।


प्रेम न क्षणिक चिंगारी है,

यह तो गहराई अपार है।

उसकी आँखों में ब्रह्मांड,

उसकी हँसी में संसार है।


उसके संग मिलती सच्चाई,

अनंत गगन, अमर तरुणाई।

बाकी सब धुंधला सा लगता,

उसके संग ही जीवन छाई।


हर स्वप्न में वह ही बहती,

नदी समान हृदय में रहती।

उसकी हँसी – पावन राग,

जो समय से परे मुझे ले जाती।


उसके बिना मैं भटका जहाज़,

उसके संग हूँ संपूर्ण आज।

उसकी वाणी, समीर की धुन,

मुझको देती मुक्ति का यज्ञ।


प्रेम यही है, अनंत अग्नि,

तारों से ऊँचा, नभ से भी गगन।

समय न दूरी इसे मिटा पाए,

यह है अमर, यही है जीवन।



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