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Showing posts from May, 2026

साझी धूप का सफ़र

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  मोहब्बत मेरे दिल में यूँ उतरती चली आई,  कि जैसे सूखी मिट्टी में कोई बारिश समाई।  किसी ने दिल को सिखलाया नहीं अपना बना लेना,  कली ख़ुद सीख जाती है बहारों में हँसा देना। // शादी कोई रंगीं ख़्वाब या बस इश्क़ का दरिया नहीं,  ये साधारण से लम्हों में छुपा गहरा फ़लसफ़ा सही।  दो अधूरे लोग मिलकर यूँ सफ़र करना भी सीखें,  कि मुकम्मल होने से बढ़कर किसी का साथ ही देखें। // नदियाँ जाकर समंदर में भले पहचान खो दें सब,  मगर उनके वजूदों का कहीं रिश्ता नहीं जाता अब।  इसी तरह दो रूहें भी विवाहों में उतरती हैं,  अलग रहकर भी धीरे-धीरे इक धड़कन-सी लगती हैं। // गर्मियों की धूप शहरों पर थकन बनकर उतरती है,  हवा भी जैसे चिड़चिड़े किसी इंसाँ-सी लगती है।  उसी मौसम में वो बच्चों को लेकर घर से जाती है,  मिरी दुनिया की हर रौनक भी संग अपने ले जाती है। // अचानक घर की दीवारें मुझे बातें सुनाती हैं,  ख़मोशी की कई तहें मुझे जीना सिखाती हैं।  सुबह जब ख़ुद ही उठकर मैं अकेला चाय पीता हूँ,  बर्तनों की उस ख़मोशी में तिरा होना ही जीता हूँ। // तभी ए...

नया औज़ार (Rewrite free lines)

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मैं राख बटोर कर गुफा की दीवारों पर लकीरें खींचता रहा, हथौड़े और छेनी से ज़िंदगी को बेरहमी से पीसता रहा। हाथों की दरारें लहू से भर गईं, पर मुझे गुमान था- कि दर्द ही बस कला है, और संघर्ष ही बस ज्ञान था। // तभी कुछ लोग आए, जिनके हाथों में रोशनी और फौलाद थे, वो बिजली से बातें करते थे, वो मशीनों के उस्ताद थे। मैंने अपनी सदियों की मेहनत से जो एक साया भी न ढाला था, उन्होंने पलक झपकते ही एक नया पहाड़ तराश डाला था। // मेरी आँखें जलन से भर गईं, मैंने उनके हुनर को कोसा, कहा-"ये कला नहीं, ये धोखा है, मशीनी चाल है सिर्फ, भरोसा न करना!" कहा-"इन लोहे के टुकड़ों में भला कहाँ कोई रूह होती है? बिना दर्द के जो पैदा हो, वो कला भी क्या अछूती होती है?" // पर तभी एक अंदरूनी चीख उठी, जैसे हड्डी पर लोहा लगा, एक ख्याल की छेनी चली, और मेरा भरम का महल ढहने लगा। हवा ने मेरे कानों में फूँका: "तुम इस ज़िद को ज्ञान कह रहे हो? तुम बहते समंदर के आगे, एक टूटे कुएँ में सड़ रहे हो!" // तब खुली आँखें, और समझ आया कि- मशीन चाहे कितना भी बड़ा पहाड़ काट दे, पर उस मूर्ति का पहला नक्शा किसने सोचा था...

औज़ार

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  मैं गुफाओं की काली दीवारों पर कोयले से सपने लिखता था, उँगलियों से खून टपकता था और मैं उसे ही कला समझता था। मैंने छालों को सम्मान कहा, दर्द को अपना धर्म बनाया, टूटे हथौड़ों की आवाज़ों में जीवन का संगीत सुन पाया। फिर बिजली बुनने वाले आए, काँच से बातें करने वाले, क्षण भर में संसार रच देते— रोशनी के नए उजाले। मैं पत्थर घिसता रह जाता, वे आकाश तराश के लाते, मैंने जलन में हँसकर बोला— “ये कलाकार नहीं कहलाते।” “ये सब मशीनों की चालें हैं, इनमें न आत्मा, न गहराई।” जैसे बाँसुरी खुद गाती हो, जैसे कलम स्वयं लिख पाई। तब हवा दरारों से बोली— “तू पीड़ा को पूजा समझे, औज़ारों के बोझ तले ही अपने सपनों को कुचले।” “क्या नाव बुरी हो जाती है क्योंकि चप्पू तेज़ चलाते? क्या सूरज कम सुंदर होता यदि प्रकाश तुरंत आ जाते?” सच बिजली बनकर गिरा तब, मन की गुफाएँ टूट गईं, जो दुनिया मैंने पकड़ी थी वो मुट्ठी से ही छूट गई। कोयले का वह युग गया अब, स्याही वाले दिन भी बीते, अब विचारों की गति लेकर कृत्रिम बुद्धि के युग जीते। पर सुन लो ऐ ज्ञान के रक्षक, जो खुद को बुद्धिजीवी कहते— AI केवल औज़ार है बस, विचार मनुष्य के ही रहते...

राख में रौशनी

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  कभी राहें हमसे मिली ही नहीं, फिर भी नज़र तुझे ढूँढती रही; इस भीड़ और शोर की दुनिया में, लगता था तक़दीर तेरी ही रही। *** हर मोड़ पे दर्द का ताल था, हर दिल में ख़ामोश तूफ़ान मिले; फिर भी उम्मीद का दीपक जलता, अँधेरों में तेरे निशान मिले। *** लोगों ने तुझको चाँद कहा था, एक ख़्वाब, जो छूने से दूर रहा; मैंने तो बस इतना चाहा था- तेरा सच मेरी आँखों में रहे। *** मैं कोई महका हुआ बाग़ नहीं, बस उजड़ा हुआ एक मिट्टी हूँ; जहाँ पुरानी हँसी की आहट, अब भी धूल में तन्हा गूँजे। *** जब भी तेरी परछाई उतरी, दिल के बिखरे तारे जुड़ने लगे; सूनी रातों के वीराने में, कुछ भूले सपने फिर जगने लगे। *** अपने बालों की ओट से निकल, दुपट्टे से यूँ चेहरा मत छुपा; एक बिजली बन मेरे सामने आ, और सूनी रातों को चाँद बना। *** ठोकर ने हर कदम पर रोका, तन्हाई ने जीना सिखला दिया; टूटे पंखों से उड़ना सीख लिया, दर्द ने भी गाना सिखला दिया। *** अब सोचता हूँ क्या मिलेगा- मोहब्बत या काँटों की राहें; ज़िंदगी शायद एक सिक्का है, जो हार-जीत में बँटती जाए। *** तेरे बाद कोई अपना न हुआ, तू दिल का आख़िरी सपना रही; राख में अब भी आग बची है, इ...

पिंजरा तोड़ दो

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प्यारी बेटियों, उन नियमों को तोड़ दो जिन्होंने तुम्हारे पंखों को डर सिखाया, तुम पैदा नहीं हुई चुपचाप सहने के लिए, न ही घुट-घुटकर मिट जाने के लिए। *** उस नियम को तोड़ दो जो दर्द छिपाए, और चुप्पी को गरिमा का नाम दे, तुम्हारे भीतर की काँपती आवाज़ दबने नहीं, ऊपर उठने के लिए है। *** उस सोच को भी अब तोड़ डालो जो तुम्हारी कीमत रिश्तों से आँके, कोई पवित्र धागा इतना बड़ा नहीं जितनी बड़ी तुम्हारी जीवित आत्मा है। *** तुम्हारे हाथ सिर्फ़ बोझ उठाने या आँसुओं के घड़े ढोने को नहीं बने, किस्मत कहकर दुख सहते रहना तुम्हारी नियति कभी नहीं थी। *** तुम पर कोई कर्ज़ नहीं उन लोगों का जो डर के कारण वहीं ठहर गए, तुम्हारी पहली वफ़ादारी उसकी है जो लड़की अब भी भीतर जीवित है। *** खुद को आज़ाद करना लौटना है अपने ही पेड़ की हर टूटी डाल तक, और काट देना उन रस्सियों को जिनसे पीढ़ियों की औरतें बँधी रहीं। *** तुम पैदा नहीं हुई उन लोगों के लिए जो तुम्हारी रोशनी छीन लेते हैं, जो घर तुम्हें भीतर से तोड़ दे वह रहने के योग्य घर नहीं। *** अगर प्रेम काँटों का पिंजरा बन जाए तो अपनी रूह के मुरझाने से पहले निकलो, किसी स्त्री से यह...