रावण गाथा

 


सुनो गाथा उस वीर की, जो लंका का शिरमौर था,  

ज्ञान, तप, बल का संगम, दशानन जग में गौर था।  

जिसे जगत ने असुर कहा, पर था वह नीति का धनी,  

शिव का प्रिय, वेदों का ज्ञाता, रण का नायक, रावणी।  



स्वर्णमयी वह लंका नगरी, सागर पर जैसे दीप जले,  

रत्नजटित मीनारों से नभ में ध्वज पवन संग उठ चले।  

प्रजा सुखी, पथ शांति भरे, धन की न कभी कमी रही,  

धर्म-अधर्म का ज्ञान लिए, सभा में नीति सदा बही।  


रावण बैठा सिंहासन पर, दस नेत्रों में तेज अपार,  

एक मुख वेदपाठ करे, अन्य मुख में रण का हुंकार।  



उत्तरी भू हो या दक्षिण, सबने मानी उसकी शक्ति,  

रथ जब निकला रण-मार्गों पर, धरती हिली, थम गई भक्ति।  

राजा झुकते, नदियाँ रुकतीं, पर्वत काँपे उसके संग,  

"जय लंकेश्वर" की ध्वनि गूँजी, जैसे वज्र की भीतरी जंग।  



वन में एक क्षत्रिय खड़ा, धनुष ताने गंभीर दृष्टि,  

मृदुल मुख पर पराक्रम की, आभा, तप की अद्भुत सृष्टि।  

रावण बोला – "हे रामकुमार! दो कर मुझे समर्पण दान,  

या फिर रणभूमि में दिखलाओ, क्षत्रिय की अद्भुत पहचान।"  


राम चुप, पर आँखों में था दृढ़ संकल्प अडिग अपार,  

दो महाबलि आमने-सामने, धरा बनी रण का विस्तार।  



हाय! घनघोर काल ने छीन लिया रावण का अभिमान,  

गिरा इन्द्रजीत रणभूमि में, वीरों का था वह अरमान।  

ब्रह्मास्त्रधारी, मायावी बल, जिसे देव भी मानते थे,  

राम-लक्ष्मण के सम्मुख वीर, प्राण त्याग कर अमर बने।  


रावण का हृदय हुआ विखंडित, जैसे पर्वत टूट पडे़,  

अश्रु ढलकते अग्नि समान, वाणी जैसे वज्र गडे़।  


वन की कन्या, जनक की संतान, तपस्विनी दृढ़ व्रतधारिणी,  

कैद में भी ज्वाला-सी ज्योति, सत्य की अडिग प्रहरिणी।  

रावण बोला – "तेरा सौंदर्य लंका का ताज बनेगा",  

सीता बोली – "धर्म पत्थर है, चाहे प्रलय जगत सनेगा।"  


रावण मौन, मन ही मन जान गया यह सत्य महान,  

नारी-धैर्य, तप की शक्ति, रण के सम बलवान।  


गगन गूँजा, भूमि थर्राई, समुद्र उठा लहरों संग,  

रावण-राम धनुष उठाए, रण बना प्रलय का रंग।  

बाणों की वर्षा हुई प्रचंड, रथ टूटे, रथी डटे,  

गर्जन करता रावण वीर, मृत्यु द्वार तक अडिग खड़े।  


एक बाण जब राम का आया, छेद गया तन के भीतर,  

रावण गिरा, पर गिरते-गिरते, गूँजा स्वर नभ के पथ पर –  

"मैं रावण हूँ, मैं यशस्वी हूँ, रण का सिंह, महाकाल,  

शरीर मिटे पर आत्मा मेरी, गूँजेगी युगों की ताल।"  


गिरा हुआ तन, पर अमर स्मृति, लंका अब भी गान करे,  

उस सम्राट का, जो ज्ञान-दीपक, शिवभक्त, बलवान रहे।  

विभीषण ने राज्य सँभाला, सीता लौटी अयोध्या धाम,  

पर रावण की गाथा गूँजी, युगों युगों तक उसका नाम।  


जो उसे असुर कहे, वह जाने, असुर भी थे कभी ऋषि समान,  

बल और ज्ञान का अद्भुत संगम, रावण का है अमर गान।  

वह खलनायक ही क्यों कहलाए, जब वीरता में था महान,  

रावण गाथा सुनकर देखो, क्या है नायक, क्या है अपमान।  

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