मौन प्रेम का जज़्बा

 अविराम प्रेम का जज़्बा, शब्दों से परे है,

तेरे मौन द्वार पर, मेरा हृदय बसेरे है।

साँझ की कली सी कब से तड़पती रही,

तेरे सांसों का स्पर्श, मेरी आत्मा में छिपी रही।  


आशा की लौ तले, पतंगे भटकते रहे,

खामोशी की शिला पर, मन के गीत खामोश रहे।

कोई स्वर न आया, न कोई उत्तर मिला,

मौन की चादर तले, सपनों का सिलसिला फिसला।  


तेरे आँसू का सागर, डूब गए मेरे स्वप्न,

गहरी नदी बन, बह गई वो हर एक उमंग।

मेरा हृदय पत्थर सा, डूबते हुए जहाज सा,

तेरे दुख के सागर में, खोता रहा हर मारा।  


तेरे मौन का साया, स्वप्नों को मिटा गया,

तेरे विचार ज्वाला की तरह, नयन में सजा गया।

सितारों की चोट से, अंधकार चीरते हैं,

मुझे घेरते हुए, भटके जहाज जैसे प्रतीत हैं।  


प्रेम की ज्वाला में, पत्ते जैसे जले,

ध्वनि की राख में भी, नाम तेरा ही पलते रहे।

फिर भी, फीनिक्स की तरह, राख से उठा,

नई आभा लेकर, अंधकार में जगमगा उठा।  


मेरा मन तीर्थयात्री, तेरे पथ पर चलता,

तेरी छाया को थामकर, वंदन करता, मनुजता।

सुबह और संध्या, जब तू लौटे उस राह,

मेरी आत्मा की मिट्टी में, चाह की छाप रहे सदा।  


उस दिन पवन भी बोलेगा, मुस्कान के संग,

"तेरे प्रेम से अनमोल है यह जीवन का रंग।"


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