आख़िरी लोरी
सुबह की ख़ामोशी से पहले की घड़ी में,
फटे हुए, ख़ाक-आलूद आसमाँ के तले,
एक माँ वीरान कमरे की गोद में,
ज़िंदगी का एक नन्हा दिया थामे बैठी है।
दीवारें मलबा, छत बिखर चुकी,
फिर भी लबों पे एक धीमी सी लोरी है,
कि उसकी बाँहों में, कमज़ोर सी साँस लिए,
उसकी बच्ची अभी ज़िंदा है।
“सो जा…” वो सरगोशी में कहती है,
सूखे होंठ रुख़्सार से लगाती,
मगर सीना है ख़ाली, जिस्म थका हुआ,
जैसे सूखा दरिया, उजड़ा चमन।
न दूध की रवानी, न राहत का लम्स,
सिर्फ़ एक माँ का गहरा सा दर्द,
नन्हे लब ढूँढते रहते हैं बेकार,
और वो अपनी ख़ामोश सिसकी पी जाती है।
न रोटी, न दाना, न कोई ग़िज़ा,
न पेट भरने का कोई ज़रिया,
न एक क़तरा साफ़ पानी नसीब,
बस ख़ौफ़ की धूल और काँपती सी रूह।
न ओढ़ने को कपड़ा, न सर्दी से पनाह,
न रात के अँधेरे से कोई निगहबान,
बस काँपते हाथ उसे सीने से लगाए,
हर सियाह रात में उसे बचाते।
बाहर की दुनिया ने मुँह मोड़ लिया,
ख़ाली कटोरों और वीरान फ़िज़ाओं से,
हवा में बिखरी बेआवाज़ फ़रियादों से,
और ग़म के गहरे बीजों से।
“ख़्वाब देख” वो नर्मी से कहती है,
“ऐसी ज़मीं जहाँ जंग का नाम न हो,
जहाँ दरिया भरपूर बहते हों,
और दरख़्तों पे फल मुस्कुराते हों।
जहाँ हँसी हवा में रक़्स करती हो,
और ज़रूरतें भी गुम हो जाएँ,”
उसकी आवाज़ नाज़ुक सही,
मगर उजड़े जहाँ में अब भी ज़िंदा है।
इस बंजर ज़मीं पे भी कहीं,
मोहब्बत साँस लेती है,
उसके काँपते हाथों में अब भी,
एक उम्मीद पलती है।
वक़्त बुझती शम्अ सा ठहरा हुआ,
हर साँस एक जद्दोजहद,
मगर बच्चे की हल्की सी आह में,
वो जीने की वजह पा लेती है।
सो जा मेरी जान, दर्द से दूर,
ख़्वाबों में फिर बरसेगा नूर,
जहाँ ज़िंदगी थी नरम और मेहरबान,
और कोई भूखा न था, न परेशान।
और अगर फ़र्दा कभी न आए,
या ये लोरी भी ख़ामोश हो जाए,
तो याद रखना इस स्याह रात में-
तू ही मेरी रौशनी थी, मेरा आख़िरी सितारा

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