राख में रौशनी

 



कभी राहें हमसे मिली ही नहीं,

फिर भी नज़र तुझे ढूँढती रही;

इस भीड़ और शोर की दुनिया में,

लगता था तक़दीर तेरी ही रही।

***

हर मोड़ पे दर्द का ताल था,

हर दिल में ख़ामोश तूफ़ान मिले;

फिर भी उम्मीद का दीपक जलता,

अँधेरों में तेरे निशान मिले।

***

लोगों ने तुझको चाँद कहा था,

एक ख़्वाब, जो छूने से दूर रहा;

मैंने तो बस इतना चाहा था-

तेरा सच मेरी आँखों में रहे।

***

मैं कोई महका हुआ बाग़ नहीं,

बस उजड़ा हुआ एक मिट्टी हूँ;

जहाँ पुरानी हँसी की आहट,

अब भी धूल में तन्हा गूँजे।

***

जब भी तेरी परछाई उतरी,

दिल के बिखरे तारे जुड़ने लगे;

सूनी रातों के वीराने में,

कुछ भूले सपने फिर जगने लगे।

***

अपने बालों की ओट से निकल,

दुपट्टे से यूँ चेहरा मत छुपा;

एक बिजली बन मेरे सामने आ,

और सूनी रातों को चाँद बना।

***

ठोकर ने हर कदम पर रोका,

तन्हाई ने जीना सिखला दिया;

टूटे पंखों से उड़ना सीख लिया,

दर्द ने भी गाना सिखला दिया।

***

अब सोचता हूँ क्या मिलेगा-

मोहब्बत या काँटों की राहें;

ज़िंदगी शायद एक सिक्का है,

जो हार-जीत में बँटती जाए।

***

तेरे बाद कोई अपना न हुआ,

तू दिल का आख़िरी सपना रही;

राख में अब भी आग बची है,

इसलिए साँसों में रौशनी रही।

***

चल फिर से कोई शुरुआत करें,

न बड़े वादे, न झूठे इकरार;

बस एक नज़र और हल्की मुस्कान,

और तेरे नाम ये सारा संसार।

                                                   -मनोरेखा -Jayankarthika   

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