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अनंत प्रेम

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मन की नीरव गहराइयों में, एक तड़प है, एक मधुर पीड़ा। उसके होने की चाह लिए, सपनों में झिलमिलती क्रीड़ा। बिन प्रेम के जीवन सूना, रंगहीन, जैसे टूटा सपना। उसके बिना हर क्षण अधूरा, दिन भी शीतल, रात भी तन्हा। उसके स्पर्श की लालसा, रेत में जैसे अमृत-धारा। उसकी साँसों की गूंज सुनूँ, डर मिट जाए, जीवन सँवारा। प्रेम न क्षणिक चिंगारी है, यह तो गहराई अपार है। उसकी आँखों में ब्रह्मांड, उसकी हँसी में संसार है। उसके संग मिलती सच्चाई, अनंत गगन, अमर तरुणाई। बाकी सब धुंधला सा लगता, उसके संग ही जीवन छाई। हर स्वप्न में वह ही बहती, नदी समान हृदय में रहती। उसकी हँसी – पावन राग, जो समय से परे मुझे ले जाती। उसके बिना मैं भटका जहाज़, उसके संग हूँ संपूर्ण आज। उसकी वाणी, समीर की धुन, मुझको देती मुक्ति का यज्ञ। प्रेम यही है, अनंत अग्नि, तारों से ऊँचा, नभ से भी गगन। समय न दूरी इसे मिटा पाए, यह है अमर, यही है जीवन।

मेरी जीवन की लहरें

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जैसे ज्वार चूमते हैं मेरे बेचैन तट को, बिना थके बहती रहती हैं मेरी लहरें, आशा और भय का नृत्य, एक फुसफुसाहट जिसे केवल मैं सुन सकता हूँ।   वे सपनों के साथ उठती हैं—उज्जवल और साहसी, हर लहर में एक कहानी, जिसे मैंने दोहराया है, अप्रत्याशित, प्रचंड, और व्यापक— एक यात्रा, जिसे केवल मैं ही सवारी कर सकता हूँ।   कुछ लहरें कोमल, धीमी, और शांत होती हैं, उतार-चढ़ाव में एक मीठी लोरी। वे मुझे उपहार देती हैं—मित्र का गर्म हाथ, सुनहरी सुबह की शांति, एक अनमोल स्मृति जिसे मैं संजोता हूँ। वे मुझे कोमलता में समेटती हैं, और छोड़ जाती हैं एक शांत, सुखद निशान।   वहीं, दूसरी लहरें गरजती हैं, प्रचंड शक्ति से— रात के अंधकार में तूफान जैसी। वे लाती हैं दर्द का कड़वा अहसास, अचानक बोझ का भारीपन। टूटा भरोसा, झूठी फुसफुसाहट, झिलमिलाते सपने का अंत, मेरी शक्ति को परखते हुए, आग को भड़काते हुए, गहरी इच्छा को जाग्रत करते हैं।   हर लहर की अडिगता में, मैं नृत्य सीखता हूँ, अपना मार्ग ढूँढता हूँ— थरथराती रेत पर खड़ा होना, हाथ बढ़ाना, सहायता देना। जहाँ लहरें टकराती हैं, उस जगह में, एक गहर...

भारत भूमि

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  मौन फुसफुसाहटों से उठे ध्वनि, गहरे सत्य की अथक गूँज। माँ धरती, करुणा की मूरत, असीम करुणा का सागर, अनंत वज़ूद।   मनुष्यों की आकांक्षा पूर्ण, वह वरदायिनी, प्रकाशमय। ईश्वरों का अवतार, ज्योति का स्रोत, अंधकार में दीपक सा जलता।   यहाँ ज्ञान की गंगा बहती, यहाँ धर्म की नींव टिकी, कला और विज्ञान का जन्म हुआ, यहाँ हर साँस में जीवन पलता।   चौदह लोकों में शोभायमान, वेदों ने उसकी महिमा गाय। सपनों सा विलक्षण यह धरा, जम्बूद्वीप महान, अडिग और सुहानी।   हिमालय का मस्तक ऊँचा, सागर धोता चरण, हर नदी गाती एक कहानी, हर पत्थर में है एक दर्शन।   सात द्वीपों का महान विस्तार, भारत की अनूठी पहचान। हृदय की धरती, कमल खिला, पर्वत महान, दुख हरता।   संस्कृति का संगम यहाँ, अनेकता में एकता का सार, हर त्योहार एक कहानी कहता, हर बोली में है प्रेम का संचार।   नवखंडों का मोती प्रकाशमान, भारत भूमि का उज्ज्वल प्रतिबिंब। कर्मभूमि, साधना की भूमि, ऋषि-मुनि का वंदन, उनका जय।   गुरुओं ने यहाँ सत्य खोजा, शिष्यों ने ज्ञान का दीप जलाया, आध्यात्मिक ...

मौन प्रेम का जज़्बा

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  अविराम प्रेम का जज़्बा, शब्दों से परे है, तेरे मौन द्वार पर, मेरा हृदय बसेरे है। साँझ की कली सी कब से तड़पती रही, तेरे सांसों का स्पर्श, मेरी आत्मा में छिपी रही।   आशा की लौ तले, पतंगे भटकते रहे, खामोशी की शिला पर, मन के गीत खामोश रहे। कोई स्वर न आया, न कोई उत्तर मिला, मौन की चादर तले, सपनों का सिलसिला फिसला।   तेरे आँसू का सागर, डूब गए मेरे स्वप्न, गहरी नदी बन, बह गई वो हर एक उमंग। मेरा हृदय पत्थर सा, डूबते हुए जहाज सा, तेरे दुख के सागर में, खोता रहा हर मारा।   तेरे मौन का साया, स्वप्नों को मिटा गया, तेरे विचार ज्वाला की तरह, नयन में सजा गया। सितारों की चोट से, अंधकार चीरते हैं, मुझे घेरते हुए, भटके जहाज जैसे प्रतीत हैं।   प्रेम की ज्वाला में, पत्ते जैसे जले, ध्वनि की राख में भी, नाम तेरा ही पलते रहे। फिर भी, फीनिक्स की तरह, राख से उठा, नई आभा लेकर, अंधकार में जगमगा उठा।   मेरा मन तीर्थयात्री, तेरे पथ पर चलता, तेरी छाया को थामकर, वंदन करता, मनुजता। सुबह और संध्या, जब तू लौटे उस राह, मेरी आत्मा की मिट्टी में, चाह की छाप रहे सदा।...

रावण गाथा

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  सुनो गाथा उस वीर की, जो लंका का शिरमौर था,   ज्ञान, तप, बल का संगम, दशानन जग में गौर था।   जिसे जगत ने असुर कहा, पर था वह नीति का धनी,   शिव का प्रिय, वेदों का ज्ञाता, रण का नायक, रावणी।   स्वर्णमयी वह लंका नगरी, सागर पर जैसे दीप जले,   रत्नजटित मीनारों से नभ में ध्वज पवन संग उठ चले।   प्रजा सुखी, पथ शांति भरे, धन की न कभी कमी रही,   धर्म-अधर्म का ज्ञान लिए, सभा में नीति सदा बही।   रावण बैठा सिंहासन पर, दस नेत्रों में तेज अपार,   एक मुख वेदपाठ करे, अन्य मुख में रण का हुंकार।   उत्तरी भू हो या दक्षिण, सबने मानी उसकी शक्ति,   रथ जब निकला रण-मार्गों पर, धरती हिली, थम गई भक्ति।   राजा झुकते, नदियाँ रुकतीं, पर्वत काँपे उसके संग,   "जय लंकेश्वर" की ध्वनि गूँजी, जैसे वज्र की भीतरी जंग।   वन में एक क्षत्रिय खड़ा, धनुष ताने गंभीर दृष्टि,   मृदुल मुख पर पराक्रम की, आभा, तप की अद्भुत सृष्टि।   रावण बोला – "हे रामकुमार! दो कर मुझे समर...

एक ही आकाश तले

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  रेखाओं में जग देखा मैंने, काले-सफ़ेद सख़्त सपने। अंधियारा और उजियारा, बँटा रहा मन का गुज़ारा। भय ने बाँधा जीवन सारा, साझी धरती, राहें न्यारा। पर फिर देखा सत्य अधूरा, क्षण-क्षण बीते, समय न दूना। हम चिंगारी क्षणिक प्रकाश, सपनों से भरते इतिहास। सितारों जैसे जलकर खोते, धूल उसी की सब संजोते। तो क्यों दीवारें खड़ी करें? जाति-धर्म के बीज धरें? जब अंत सभी मिट्टी बन जाते, एक ही छंद में लौटे आते। हम सब प्रेमजन्मे प्राणी, एक गगन की छाँव सयानी। रेखाएँ सब छोड़ चलें हम, दिल में पाएँ सच्चा घर हम। क्षणिक जीवन का यही संदेश, आलिंगन है सच्चा परिवेश।

काश

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  काश, कि मेरे भीतर का प्रकाश जगे और मेरी आत्मा को झकझोर दे, कि मेरे हर धड़कते दिल में नई उम्मीदें जागरूक हो जाएं, मैं अपने भय, संकोच और अविश्वास की दीवारें तोड़ सकूँ, और अपने सपनों की ऊंचाइयों को छूने का साहस पा सकूँ।   काश, कि मैं अपने अंदर की आवाज़ सुन सकूँ, जो अक्सर मेरी चुप्पी में दब जाती है, उस अनकहे दर्द और अनसुलझे सवालों को समझ सकूँ, और अपने भीतर की शक्ति को पहचाने की हिम्मत कर सकूँ।   काश, कि मैं अपने दिल की बात बिना झिझक कह सकूँ, अपने भावों को खुले दिल से व्यक्त कर सकूँ, सहानुभूति और प्रेम का प्रकाश फैलाकर, दूसरों के जीवन में भी उजाला कर सकूँ।   काश, कि मेरी इच्छाएँ हकीकत बन जाएँ और मेरे सपने सच में रंग लाएँ, मैं अपने जीवन के हर पल को पूरी खुशियों से भर सकूँ, साहस और विश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाऊँ, और अपने जीवन को एक सुंदर कविता की तरह संजो सकूँ।   काश, कि मैं अपने आप से प्यार कर सकूँ, अपनी कमियों और खूबियों दोनों को अपनाऊँ, और हर परिस्थिति में अपने मन की बात सुनते हुए, एक नई शुरुआत का साहस कर सकूँ।   काश, कि ...

लालफ़ीतों का साम्राज्य

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काग़ज़ की भूलभुलैया में फँसी है दुनिया, फ़ाइलों के ढेर में दबा है सच्चाई का तिनका। हस्ताक्षरों की लंबी कतार में, लोगों की जानें अटक गई हैं। एक मुहर के लिए हफ़्तों का इंतज़ार, एक दस्तख़त के लिए बरसों का ख़ुमार। दफ़्तर के गलियारों में वक़्त घिसटता है, जैसे रेतघड़ी में आख़िरी कण अटक गया हो। मेज़ के पीछे बैठे देवता, क़लम की नोक से किस्मत लिखते हैं, पर स्याही सूख चुकी है — और लोग प्यास से मर रहे हैं। जहाँ आग लगी है, वहाँ फ़ाइल खोजी जाती है, जहाँ भूख लगी है, वहाँ बैठक बुलाई जाती है, जहाँ न्याय चाहिए, वहाँ ‘प्रक्रिया’ सुनाई जाती है। ब्यूरोक्रेसी — वह अदृश्य जाल, जो समय को निगलता है, और इंसान को इंतज़ार में बदल देता है।

ज़ंजीरों का विनाश: मानवता का आह्वान

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अछूत — वे शरीर में नहीं, वे मन के अंधकार में बसे हैं, घृणा की परछाई हैं, डर की झूठी मूर्ति हैं।   हम यहाँ हैं — इस विषाक्तता को जड़ से उखाड़ फेंकने, इस झूठी मान्यता को जला डालने, जो कहती है कि खून का रंग अलग है।   रंगभेद एक जोंक है — अज्ञान के खून से फटती, चुप्पी के दलदल में फँसी, विषैली जंजीरों जैसी जकड़ी।   जाति एक सड़ता हुआ शव है — जिसे परंपरा की कायरता ने जकड़ा है, जीवन के हर रंग को रौंदने वाली, वह विषाक्त शव, जो कभी न मरता।   हम तुम्हारी झूठी ऊँच-नीच को नहीं मानेंगे, हम तुम्हारे भेदभाव को अपनी खामोशी से स्वीकार नहीं करेंगे। तुम्हारी श्रेष्ठता एक छलावा है, तुम्हारी पवित्रता — बस धूल और धोखा।   गली से संसद तक, मंदिर से अदालत तक, हम हर दीवार को गिराएँगे, जो नफ़रत की ईंटों से बनी है।   हम इंसानियत को टुकड़ों में बाँटने वाले तुम्हारे नकली विज्ञान को खारिज करते हैं। हम तुम्हारे बर्बर पैमानों को नकारते हैं। हम ऐलान करते हैं — हर रंग, हर वंश, अभिन्न है, पवित्र है, अजेय है।   सुन लो — कोई भगवान तुम्हारे अन्याय का समर्थन न...

भारी बूंद

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मैं जब महसूस करता हूँ, तो गले में दर्द उठता है, आँसुओं की कतार इतनी लंबी कि वह खामोशी को भी तोड़ देती है। मैं चाहता हूँ कि रो लूँ, बस एक बार बाहर निकाल दूँ, दिल का बोझ थोड़ा हल्का हो जाए। मगर जानता हूँ— कुछ भी बदल नहीं सकता, वही दर्द वहीं रह जाता है, शायद और भी गहरा। कभी-कभी, एक छोटी-सी आँसू की बूंद फिसल जाती है, जैसे कोई चुपके से कहता हो, "मैं यहाँ हूँ… तुम्हारे दर्द का हिस्सा।" वह हल्का सा संकेत है, एक छोटा, नमकीन मोती— जो राहत तो नहीं, बस एक नन्ही-सी उम्मीद की डोर है। वह बूंद, शायद आकार में छोटी, लेकिन उसकी यात्रा इतनी भारी, जैसे हर आँसू में छिपी हो एक दुनिया जो कहती है—"अभी भी कुछ है, जिसे जीना है।" और मैं जानता हूँ, यह बूंद भी भारी है, क्योंकि यह दिखाती है कि मेरा दर्द अभी भी जिंदा है, और मैं अब भी महसूस करता हूँ वह धड़कन— जो कभी खत्म नहीं होती।

प्यार और व्यस्तता के बीच

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  मेरा प्यार कभी नहीं जानता "व्यस्त" का अर्थ, जब दिल से चाहूं, तो समय को भी मोड़ देता हूँ, अपनी हर सुबह, हर शाम, अपनी पूरी जिंदगी, उसके लिए फिर से रचता हूँ, प्यार की ऊँची मंजिल।   अगर कहूँ "मैं व्यस्त हूँ," तो कभी इसका मतलब नहीं तुम्हारे साथ दूर होना, यह कभी बहाना नहीं, ना ही कोई झूठ, जब प्यार अंदर होता है, मैं रात की रौशनी में भी जागता हूँ, बस तुम्हारे लिए।   मैंने सुना है, "बहुत व्यस्त हूँ" का झूठ, उस दर्द को पी गया, इंतजार की लंबी रेखाओं में, लेकिन अब मैं देखता हूँ इसे साफ-साफ— यह कोई कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक चुनाव है, कोई काम का बोझ नहीं, बल्कि नियति है।   मैं कोई "व्यस्त" प्रेमी नहीं हूँ, मैं हूँ वह जो हर पल मौजूद है, जो हर आवाज़ पर, हर मौके पर, तुम्हारे पास आने को तैयार है। मेरा प्यार मेज़पर जगह बनाये रखता है, चाहे कमरा कितना भी भरा हो,   तो जब कोई कहे "व्यस्त," मैं सुनता हूँ उनके शब्दों के पीछे की सच्चाई— "मैंने तुम्हारे ऊपर कोई और चुन लिया," यही तो वो संकेत है, जो मुझे बताता है कि मुझे फिर से खुद से प्यार करना है, उसे ...

सपनों का संसार

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  मौन आशाओं में हम रहते हैं, ख्वाबों की जादूगरी में खोए हैं, "मैं तो स्वप्न देख रहा हूँ," कहते हैं, पर दिल में उम्मीद की किरण जगे हैं।   सपनों का संसार बुनते हैं हम, चाँद और सूरज के नीचे संग, "आशा है कि एक दिन तुम भी आएंगे," प्रेम का संदेश हर दिल में समाएंगे।   अंधकार को हम मिटाएंगे, सपनों का ये संसार बनाएंगे, जहाँ न कोई सीमा हो, न दीवारें, सिर्फ़ प्यार की वह मुस्कान प्यारी।   जहाँ हर आवाज़ को माना जाए, भय और द्वेष को छोड़ दिया जाए, आओ मिलकर ये सपना सजाएँ, प्रेम और शांति का गीत गाएँ।   आशा का दीप जलाएँ हम, सभी को एक साथ लाएँ हम, विश्व जब एक हो जाएगा, प्रेम का संसार खुशियों से भर जाएगा।

छोड़ दो

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  वही मैं था, जो इंतजार करता रहा— इंद्रधनुष के पीछे छुपा सूरज, मेरा मन, एक टूटा हुआ आकाश जैसे, जहां दुख ने अपनी छाप छोड़ी चेहरे पर।   मैं जलता रहा, अनजान की आग में, खो गया अपने ही अंदर, कोई ठिकाना न मिला। जीवन के सूखे फूलों से चुभा, बनी मैं कविता, बारिश की धूल में।   मेरे शब्द अनकहे, फंसे गले में, आँसू बन गए उलटे दृश्य, खामोशी की चादर तले। वह सपना, जिसे मैं छोड़ आया था, वहीं लौट आया, जहां मैं मर चुका था— विचारों की राख, ध्वनि की ज्वाला, और आग का संगम, जहां अव्यवस्था गुनगुनाती, नाम पुकारती।   मैं हर छाया में भटका, सच को छुपाता रहा, पूछने का साहस न कर सका। फिर धीरे-धीरे, रात की सीमा से, एक परदा हिला, मंद प्रकाश की ओर।   विचारों की इस ज्वाला में, जो कभी निराश थी, दो शब्द उभरे, सौम्य और चमकदार: “छोड़ दो।” और उस शांति की सांस में, मैं मृत्यु के पार उठ खड़ा हुआ।   आग, मौन, और अंततः— मैं मुक्त हो गया— मुक्ति का वह उपहार: जीवन की इच्छा।

रात की रानी

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जैसे रात की रानी के फूल झरते हैं, बिखरते हैं, मैं खड़ा हूँ चाँदनी में, पीड़ा का सागर लिए। तुम्हारी छुअन जैसे मंद हवा का झोंका, भूलेपन की बारिश में भी स्मृति अटल बनी रहे।   आंसुओं के फूलों में जलती है आग मेरी, बसंत की लालसा फिर भी मन में खिलती है। संवेदनशील हाथों का तेरा स्पर्श पाने को, मैं प्रतीक्षा करता रहा, मृत्यु तक भी तेरा इंतजार।   वो प्रेम का गीत, जो क्षणभर मेरी आत्मा ने सुना, अंतहीन उष्मा, कभी न ठंडी होने वाली। मिट्टी में दफन हो जाए आग, फिर भी, तेरी यादें भरें मेरे हृदय का आंगन।   दूर होकर भी, तू मेरे स्वप्नों में समाई है, जैसे चमेली की बेल, सौम्य छाया डालती है। रात की ठंडी सांस में, एक बूंद वर्षा की, तू जला देती है प्रेम का दीप मेरे सीने में।   अगर जीवन की राह से तू अदृश्य हो जाए, फिर भी प्रेम की लौ जलती ही रहेगी। इस अंधकारमय मार्ग में, तू मेरी मार्गदर्शिका, सदा प्रज्वलित, मेरी आत्मा के कोर में।   ओस की बूंद जैसी, तू मेरे हृदय में घुल गई, मृदुल मुस्कान जैसी, स्थिर, कभी न मुरझाने वाली। जैसे सुबह की सुनहरी किरणें शाम को स्थान देती ...

प्रिये साथी

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  राधा, कृष्ण की प्रिय साथी, प्रेम की मूरत, कलिंदी के तट पर, जहां बहती है सुखद बयार। बंसुरी की मधुर तान पर, मन की मल्लिका झंकृत, प्रेम का यह सागर, अनंत, अविराम, अपार।   पायल की झंकार में, रीतियों का संगीत है, मुरली की रुनझुन में, हर पल का गीत है। राधा-रमण का प्रेम, अमर कथा है कहानियों में, साहस से भरा हृदय, जीवन का संगीतमय पहलू है।   देवी जैसी दिव्य, प्रकाशमय वह, सभी प्रेयसियों में, रानी वह, अनूठी वह। हर सांस में छुपा प्रेम का रंग, जैसे नयनों में बसी प्रेम की उमंग।   चाँदनी में चलते, रेत पर पदचिह्न, नयन में खोजें, उसकी झलक हर क्षण। पत्तों और फूलों में भी उसकी पीड़ा, संगीत में गूंजता, प्रेम का अनमोल धड़कन।   उसका स्वर—नदी सा, गहरा और निर्मल, उठाता कृष्ण को योगनिद्रा से हर पल। रागों में बुनती आत्मा की तस्वीर, उसकी गीत में बसती शांति और प्यार।   वृंदावन की गलियों में, झंकारें चूड़ियों की, मोर नृत्य करें, और मन खिल उठे हर पल। गोपियाँ कर लें प्रीत, पर उनकी जैसी कोई नहीं, प्रभु के विश्वरूप का अनुभव, बस यहाँ ही संभव है।   मुरली क...

प्रकाश और छाया

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  प्राचीन धूल से उभरती आत्मा का सफर, भोर और संध्या के अनगिनत सफर। हमारा लक्ष्य है पवित्र प्रेम का दीप, अव्यर्थता को त्याग, खोजें जीवन का मर्म।   अंधकार में कहीं खो जाएं तो क्या, सच्चाई की राहें ही हैं हमारी आशा। शुद्ध हृदय मंदिर की ज्योति जलाएं, सत्य का प्रतिबिंब बन, अंधकार मिटाएं।   यह केवल अपने लिए नहीं, यह है आंतरिक प्रकाश, साझा करें प्रेम की किरणें, बनें एक स्वप्न का सार। यदि आत्माएँ स्वार्थ की जंजीरों में जकड़ी हैं, तो संवाद और संबंध खामोशी में दब जाएं।   प्रेम ही भाषा है, जो हर दिल समझता है, सहायता के हाथों में ही रची जाती है बात। सुनने का कान, साझा भोजन का जज़्बा, संदेह मिटाए, भय दूर करें, बनें एक साथ।   मगर यदि मन का मौन गहराई में उतर जाए, अन्‍हीं जरूरतों का शोर हवा में फैल जाए। तो क्षमा बन जाए शांति का स्रोत, आत्मा को ऊंचाई दे, खोलें हर जंजीर का छोर।   स्वार्थरहित कर्म हैं सबसे बड़ा उपहार, दुनिया की टूटी-फूटी रचनाओं को जोड़ने का प्रयास। हर आत्मा में चमकने का अवसर है, सशक्त हाथ से, दैवीय स्पर्श का आह्वान।   वर्ना उ...

बीज से अंकुर तक

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मैं था एक कोमल अंकुर, बीज से जगा हुआ, सपनों की कोरों में बसता, आशा का सवेरा। हरे पन्नों पर मंजिलें लिखता, कल्पनाओं की कहानी, उज्ज्वल किरणों में खिलता, उम्मीद का दीया। सपने थे जैसे बसंत की हवाएँ, खिलखिलाते फूल, सुनहरी किरणें जैसी, झिलमिलाते आसमां का बुलावा। संघर्षों की धूप में भी, मैं झुका नहीं, मिट्टी की खुशबू से महकता, जीवन का संगीत। फिर समय की गिरि पर, छाया का साया आया, सपने मुरझाने लगे, टूट गए, बिखर गए। पत्तियाँ झरने लगीं, जैसे जाड़े की ठंडी हवा, खामोशी की चादर में ढक गए, मेरी ख्वाहिशें। भीतर छुपी एक टीस, दर्द का ज्वालामुखी, वो चाह जो अब यादों में सिमटी हुई। बारिशें आईं, जैसे अमृत की बूंदें, जीवन को फिर से सींचने का संदेश। मैं सूखा रहा, मौन और खामोश, बंजर धरती सी, जीवन की तलाश में। धरती ने दिया आशियाना, नवजीवन का वादा, पर विश्वास के कमजोर धागों में, मैं खो गया। शायद मैं एक सूखा वृक्ष बन गया, या फिर बग़ीचे की लता, बिना सहारे की। आसमान की ओर बढ़ते, पर जड़ें कमजोर, भटकता रहा, अनजान राहों में। ना जड़ें पकड़ने की चाह, ना सहारा पाने की आशा, सिर्फ़ दर्द की हवा में बहता रहा। खालीपन की प्रति...

बिन डोर का मन

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रंग-बिरंगे काग़ज़ से बनी पतंग सी, मेरा मन और मैं उड़ते गगन में वहीं। ना कोई डोर, ना कोई सहारा, बस हवाओं संग बहते दो किनारा। पर कभी-कभी बादल घिर आते हैं, जैसे रंगों के पीछे साए छा जाते हैं। नकारात्मक विचार उलझी डोर समान, पंखों को बाँध दें, कर दें हैरान। हवा कभी कोमल, जैसे मधुर स्पर्श, कभी तूफ़ान, जैसे अचानक आघात। अनजान राहों में भटकते-ढूँढते, एक शांत ठिकाना जिसे अपना कहें। अराजकता के बीच ये सत्य स्पष्ट, डोर डर की नहीं—आशा की हो सशक्त। जो थामे रखे, सँभाले संभाल, मन के आँगन में रचे खुशियों का जाल। गिरते-उठते इस नृत्य में भी, छिपी है सुंदरता हर क्षण में ही। चाहे पतंग हो फटी, लड़ाई में थकी, सुबह की किरण में फिर से चमकी। चलो उड़ें दिल खोल के, बेख़ौफ़, बेक़ैद, झेलें वो आँधियाँ जिनसे थे भयभीत। क्योंकि मन, चाहे जितना उन्मुक्त हो, सीख सकता है राह—जब बादल छँटें।

स्थायी विरासत

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  फुसफुसाते जंगल में मैं खड़ी, अकेली, स्थिर चट्टान जैसी, समय का साक्षी, मौन, सजीव। जहाँ परछाइयाँ नाचती हैं गहराई में, प्रकृति का जादू मुझे करता है धीमे से धड़कने।   सूरज की सुनहरी किरणें छू गईं मुझे, जीवन का गर्म आशीर्वाद, शीतल ओस की झिलमिलाहट, दुखों को जाना, संघर्षों का सामना किया, धागों में बुना है जीवन का कोमल संसार।   बच्चों की आँखें चमकती हैं जुगनू जैसी, सपनों में झिलमिलाती हैं आशाएँ, माएँ फुसफुसाती हैं प्रार्थनाएँ, धरती और हवा में बँधी हैं उम्मीदें।   वह आई—कोमल ज्वाला, निष्कलंक प्रकाश, जिसकी आत्मा लालच और प्रसिद्धि से मुक्त, सुबह की चुप्पी में उसके कदम शांति लाते, एक पवित्र आत्मा, एक गीत की तरह मौन।   उसका लिबास सरल, गरिमा से भरा, तेजी से दौड़ती दुनिया को संजोता, हल्के पंखों जैसी हवा में झरते कदम, बोझ नहीं, सहजता से उठाता है हर भार।   धैर्य की जड़ें गहरी, चौड़ी, अटूट, जैसे पुराना पेड़, जो कभी नहीं छिपता, नदियों पर भरोसा—धीरे, पर दृढ़, धरती को आकार देता, दिलों को सहारा देता।   शांत मार्चों में, न्याय के संग्राम में, ...

साहूकार का जाल

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 गलियों की छाया और गाँव के चौराहों में, एक फुसफुसाहट भारी हवा में बहती है। जब बैंक छोटी जरूरतों के लिए अंधे हो जाते हैं, और दरवाज़े सिर्फ़ कुछ के लिए खोलते हैं, तब सावधानी से सुनो उस हाथ की फुसफुसाहट, जो पास आता है और कान में वादे कह जाता है।   वह रेशमी कपड़े नहीं पहनता, बल्कि हर चेहरे पर आँसू को जानता है। किसान, विधवा, ज़रूरतमंद को, वह मदद देता है—एक बीज की तरह, उधार में।   उसका दरवाजा दर्द और पाप को बुलाता है, एक हाथ फैलता है, सिक्का उछाला जाता है, मगर हर लाभ की कीमत छुपी होती है, उसकी मुस्कान में एक ठंडी बेरहमी है।   उसका बटुआ, एक कुआँ है जो कभी सूखता नहीं, पर तुम्हारी मेहनत का हर पैसा ब्याज बन जाता है। हर बीज पर जो वह उधार देता है, उसका लालची ब्याज निराशा का और बोझ बढ़ाता है।   खामोश लता जैसी, मजबूत और गहरी, उसका ब्याज बढ़ता रहता है, और तुम रोते रहते हो। आग की तरह वह हताश आत्माओं को गर्म करता है, मगर बेकाबू होकर, जलाता है और निगल जाता है।   वह कोई कागज़, कोई नाम नहीं चाहता, फिर भी तुम्हें बाँध लेता है एक खामोश जंजीर में। शांति क...