बिन डोर का मन


रंग-बिरंगे काग़ज़ से बनी पतंग सी,

मेरा मन और मैं उड़ते गगन में वहीं।

ना कोई डोर, ना कोई सहारा,

बस हवाओं संग बहते दो किनारा।


पर कभी-कभी बादल घिर आते हैं,

जैसे रंगों के पीछे साए छा जाते हैं।

नकारात्मक विचार उलझी डोर समान,

पंखों को बाँध दें, कर दें हैरान।


हवा कभी कोमल, जैसे मधुर स्पर्श,

कभी तूफ़ान, जैसे अचानक आघात।

अनजान राहों में भटकते-ढूँढते,

एक शांत ठिकाना जिसे अपना कहें।


अराजकता के बीच ये सत्य स्पष्ट,

डोर डर की नहीं—आशा की हो सशक्त।

जो थामे रखे, सँभाले संभाल,

मन के आँगन में रचे खुशियों का जाल।


गिरते-उठते इस नृत्य में भी,

छिपी है सुंदरता हर क्षण में ही।

चाहे पतंग हो फटी, लड़ाई में थकी,

सुबह की किरण में फिर से चमकी।


चलो उड़ें दिल खोल के, बेख़ौफ़, बेक़ैद,

झेलें वो आँधियाँ जिनसे थे भयभीत।

क्योंकि मन, चाहे जितना उन्मुक्त हो,

सीख सकता है राह—जब बादल छँटें।


Comments

Popular posts from this blog

एक परछाई सी चलती है मेरे साथ

पवित्रता की परछाईं

ज़ंजीरों का विनाश: मानवता का आह्वान

एक ही आकाश तले

आशय की सांसें

आत्मा का सफ़र

विरासत की आहट

वह अनसुना नायक

लालफ़ीतों का साम्राज्य

दो बहनों की कथा: यमुना, यामिनी और मृत्यु का संदेश