साहूकार का जाल

 गलियों की छाया और गाँव के चौराहों में,

एक फुसफुसाहट भारी हवा में बहती है।

जब बैंक छोटी जरूरतों के लिए अंधे हो जाते हैं,

और दरवाज़े सिर्फ़ कुछ के लिए खोलते हैं,

तब सावधानी से सुनो उस हाथ की फुसफुसाहट,

जो पास आता है और कान में वादे कह जाता है।  


वह रेशमी कपड़े नहीं पहनता,

बल्कि हर चेहरे पर आँसू को जानता है।

किसान, विधवा, ज़रूरतमंद को,

वह मदद देता है—एक बीज की तरह, उधार में।  


उसका दरवाजा दर्द और पाप को बुलाता है,

एक हाथ फैलता है, सिक्का उछाला जाता है,

मगर हर लाभ की कीमत छुपी होती है,

उसकी मुस्कान में एक ठंडी बेरहमी है।  


उसका बटुआ, एक कुआँ है जो कभी सूखता नहीं,

पर तुम्हारी मेहनत का हर पैसा ब्याज बन जाता है।

हर बीज पर जो वह उधार देता है,

उसका लालची ब्याज निराशा का और बोझ बढ़ाता है।  


खामोश लता जैसी, मजबूत और गहरी,

उसका ब्याज बढ़ता रहता है, और तुम रोते रहते हो।

आग की तरह वह हताश आत्माओं को गर्म करता है,

मगर बेकाबू होकर, जलाता है और निगल जाता है।  


वह कोई कागज़, कोई नाम नहीं चाहता,

फिर भी तुम्हें बाँध लेता है एक खामोश जंजीर में।

शांति का चाँदनी का आभास, लेकिन भीतर तूफ़ान,

वह ऋण देता है—और तुम्हारा जीवन तराशता है।  


जो खेत तुम जोतते हो, जो शिल्प तुम निखारते हो,

अब तुम्हारा नहीं, सब उसका अपना है।

तुम्हारा पसीना भी, एक नया कर्ज़ बन जाता है,

और तुम्हारा भविष्य अब उसकी कैद में है।  


वह शांत और ठंडा देखता है,

जैसे आशा की धीमी टिमटिमाहट मंद होने लगी हो।

कुछ लोग उसे मसीहा कहते हैं,

कुछ उसकी पकड़ को थकी हुई आहों से कोसते हैं।  


मौसम बदलते रहते हैं, और कर्ज़ चुकते हैं,

मगर अनदेखे घाव नहीं मिटते, रह जाते हैं।

कर्ज़ की जंजीरों से खरीदी गई आज़ादी,

गहरे घाव छोड़ जाती है, जिन्हें भूलना मुश्किल है।  


तो इस सिक्के का वजन समझो,

जो वह तुम्हें देता है—चमकता है, पर दाग भी लगाता है।

उसके हाथ से निकला एक रुपया,

या तो पेड़ उगा सकता है, या ज़मीन को खारा कर सकता है।  


इस कविता को ध्यान से पढ़ो,

और समझो कि साहूकार की छाया कितनी भारी हो सकती है।

क्योंकि, कहीं न कहीं,

यह जंजीरें ही तुम्हारे जीवन का असली शोषण हैं।

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