प्रिये साथी

 
राधा, कृष्ण की प्रिय साथी, प्रेम की मूरत,
कलिंदी के तट पर, जहां बहती है सुखद बयार।
बंसुरी की मधुर तान पर, मन की मल्लिका झंकृत,
प्रेम का यह सागर, अनंत, अविराम, अपार।  

पायल की झंकार में, रीतियों का संगीत है,
मुरली की रुनझुन में, हर पल का गीत है।
राधा-रमण का प्रेम, अमर कथा है कहानियों में,
साहस से भरा हृदय, जीवन का संगीतमय पहलू है।  

देवी जैसी दिव्य, प्रकाशमय वह,
सभी प्रेयसियों में, रानी वह, अनूठी वह।
हर सांस में छुपा प्रेम का रंग,
जैसे नयनों में बसी प्रेम की उमंग।  

चाँदनी में चलते, रेत पर पदचिह्न,
नयन में खोजें, उसकी झलक हर क्षण।
पत्तों और फूलों में भी उसकी पीड़ा,
संगीत में गूंजता, प्रेम का अनमोल धड़कन।  

उसका स्वर—नदी सा, गहरा और निर्मल,
उठाता कृष्ण को योगनिद्रा से हर पल।
रागों में बुनती आत्मा की तस्वीर,
उसकी गीत में बसती शांति और प्यार।  

वृंदावन की गलियों में, झंकारें चूड़ियों की,
मोर नृत्य करें, और मन खिल उठे हर पल।
गोपियाँ कर लें प्रीत, पर उनकी जैसी कोई नहीं,
प्रभु के विश्वरूप का अनुभव, बस यहाँ ही संभव है।  

मुरली की पुकार, दूर-दूर आकाश में,
राधा सुनती, आंसुओं से भरी आँखों में।
उनकी मौनता भी कहे प्रेम का गीत,
प्रेम की प्रतिज्ञा, ज्वाला बन ज्वलित।  

कोई माला नहीं भाती, उसकी दृष्टि से अधिक,
कोई रस नहीं मिठास, नयनों के मेल से अधिक।
उनका मिलन—आग का, प्रेम का अग्नि,
भक्ति जगाए, उत्कट इच्छा का सिंधु।

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