स्थायी विरासत
फुसफुसाते जंगल में मैं खड़ी, अकेली,
स्थिर चट्टान जैसी, समय का साक्षी, मौन, सजीव।
जहाँ परछाइयाँ नाचती हैं गहराई में,
प्रकृति का जादू मुझे करता है धीमे से धड़कने।
सूरज की सुनहरी किरणें छू गईं मुझे,
जीवन का गर्म आशीर्वाद, शीतल ओस की झिलमिलाहट,
दुखों को जाना, संघर्षों का सामना किया,
धागों में बुना है जीवन का कोमल संसार।
बच्चों की आँखें चमकती हैं जुगनू जैसी,
सपनों में झिलमिलाती हैं आशाएँ,
माएँ फुसफुसाती हैं प्रार्थनाएँ,
धरती और हवा में बँधी हैं उम्मीदें।
वह आई—कोमल ज्वाला, निष्कलंक प्रकाश,
जिसकी आत्मा लालच और प्रसिद्धि से मुक्त,
सुबह की चुप्पी में उसके कदम शांति लाते,
एक पवित्र आत्मा, एक गीत की तरह मौन।
उसका लिबास सरल, गरिमा से भरा,
तेजी से दौड़ती दुनिया को संजोता,
हल्के पंखों जैसी हवा में झरते कदम,
बोझ नहीं, सहजता से उठाता है हर भार।
धैर्य की जड़ें गहरी, चौड़ी, अटूट,
जैसे पुराना पेड़, जो कभी नहीं छिपता,
नदियों पर भरोसा—धीरे, पर दृढ़,
धरती को आकार देता, दिलों को सहारा देता।
शांत मार्चों में, न्याय के संग्राम में,
मशाल जलाई, अधिकारों का उजियाला फैलाया,
मोहब्बत जैसी उसकी बात, उसकी आवाज़—मधुर,
प्रकाशित करता है, आगे ले जाता है।
दया—उसके नाम में प्रेम का वास,
कोमल अग्नि, स्थिर ज्वाला,
स्वप्न देखती है उसने—खुले स्कूलों के,
खुले द्वार, दिलों की लालसा को पूरा करने को।
कहानियों को रखती है कोमलता से,
गर्मी में फलों जैसी मिठास,
उद्धार नहीं, बल्कि बहन का प्रेम,
हाथ में हाथ डाल, चलता है साथ—पवित्र भूमि पर।
उसकी आत्मा अब पेड़ों के बीच सांस लेती,
हवा में बहता है उसका वादा,
जंगल की अनुकंपा की बेटी,
उसका प्यार प्रकाश फैलाता है इस पवित्र स्थान

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