बीज से अंकुर तक


मैं था एक कोमल अंकुर, बीज से जगा हुआ,
सपनों की कोरों में बसता, आशा का सवेरा।
हरे पन्नों पर मंजिलें लिखता, कल्पनाओं की कहानी,
उज्ज्वल किरणों में खिलता, उम्मीद का दीया।

सपने थे जैसे बसंत की हवाएँ, खिलखिलाते फूल,
सुनहरी किरणें जैसी, झिलमिलाते आसमां का बुलावा।
संघर्षों की धूप में भी, मैं झुका नहीं,
मिट्टी की खुशबू से महकता, जीवन का संगीत।

फिर समय की गिरि पर, छाया का साया आया,
सपने मुरझाने लगे, टूट गए, बिखर गए।
पत्तियाँ झरने लगीं, जैसे जाड़े की ठंडी हवा,
खामोशी की चादर में ढक गए, मेरी ख्वाहिशें।

भीतर छुपी एक टीस, दर्द का ज्वालामुखी,
वो चाह जो अब यादों में सिमटी हुई।
बारिशें आईं, जैसे अमृत की बूंदें,
जीवन को फिर से सींचने का संदेश।

मैं सूखा रहा, मौन और खामोश,
बंजर धरती सी, जीवन की तलाश में।
धरती ने दिया आशियाना, नवजीवन का वादा,
पर विश्वास के कमजोर धागों में, मैं खो गया।

शायद मैं एक सूखा वृक्ष बन गया,
या फिर बग़ीचे की लता, बिना सहारे की।
आसमान की ओर बढ़ते, पर जड़ें कमजोर,
भटकता रहा, अनजान राहों में।

ना जड़ें पकड़ने की चाह, ना सहारा पाने की आशा,
सिर्फ़ दर्द की हवा में बहता रहा।
खालीपन की प्रतिध्वनि, मैं था वो,
भटकती परछाईं, सूने मैदान में।

मन की बेचैनी में, यादें भी खो गईं,
आशाओं की लौ, बुझती जा रही।
लेकिन फिर भी, मुस्कान है कहीं,
क्योंकि उम्मीदें टूटी नहीं, धड़कती हैं।

चेहरे गुज़रते जैसे परछाईं, कहानियाँ बुनते,
हर जीवन अद्वितीय, हर दास्ताँ अनमोल।
असंख्य जीवन की भीड़ में—मैं अकेला,
मौन दर्शक, भटकता पत्थर, फिर भी आशा का दीप जला।

अब ना जड़ें, ना पहचान का साया,
जीवन बिना कहानी का, कहीं बीच में खड़ा।
फिर भी इस शांति में, मैं पाता हूँ—
आशा की आवाज़, जो पीछे छोड़ आया हूँ।
उगते सूरज की पहली किरण की फुसफुसाहट,
एक वादा कि मैं फिर अपनी रौशनी पाऊँगा।

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