एक क्षण की भूल
पश्चाताप का वह दर्द, जैसे धुंधली सी छाया,
जो दिल के कोने-कोने में धीरे-धीरे समा जाता है,
उसकी गिरफ्त में जकड़ा हर आंसू, हर ख्वाब,
जैसे किसी भूले हुए मौसम का बिछड़ जाना।
अहंकार की दीवारें, खामोशी की जंजीरें,
सामने खड़ा कर देती हैं उस प्यार को,
जिसे हमने खोया, जिसे हम भूले,
उन लम्हों का अफसोस, जो लौटकर नहीं आते।
और फिर, नशे के प्यालों में डूबी रातें,
भटकती चाहतों के पीछे भागते दिन,
किसी पराई बाहों का क्षणिक मोह—
जिसकी कीमत थी, अपने घर का उजड़ जाना।
उस पल की गलती, जैसे रात का अंधेरा,
जिसमें उभरते हैं ख्वाब, फिर टूट जाते हैं,
किसी नमी में लिपटी हुई उम्मीदें,
जो कभी पूरी नहीं हो पातीं, बस रह जाती हैं अधूरी।
मौन का सागर, जो सब कुछ डुबो देता है,
और पछतावे का तूफान, जो कभी शांत नहीं होता,
हर सांस में गूंजती है उस गलती की आवाज़,
जो हमेशा दिल में एक टीस बनकर रह जाती है।
मैं खोजता हूँ उस क्षण की पुकार,
जो फिर कभी नहीं लौटेगा, न मिटेगा,
जैसे सूखे पेड़ की आखिरी शाखा,
या अंतिम पत्ते का झरना, जो गिर जाता है।
लेकिन शायद यही है सच्चा अनुभव,
जो बताता है कि प्यार का मूल्य, कितनी कीमत पर है,
और अहंकार के बंद दरवाज़े खोलने का अर्थ,
किस तरह से अपने ही दिल का घर उजाड़ दिया जाता है।
काश, उस पल मैं झुका होता,
शब्दों के बिना ही माफ़ी माँग लेता,
तो शायद, आज यह खामोशी नहीं होती,
और तुम्हारा प्यार फिर से दीपक बन जाता।
पर अब तो बस एक स्मृति है,
जो हर बार चुभती है, हर बार सुलगती है,
जैसे जलता हुआ कोई धुआं,
जो कभी नहीं बुझता, बस और फैलता है।
पश्चाताप का दर्द, जैसे एक अनकही कविता,
जो कभी खत्म नहीं होती, बस गुजरती जाती है,
और इस खामोशी में छुपी है एक सच्चाई,
कि प्यार की कीमत, बहुत ही अनमोल होती है।
काश, मैं उस गलती को फिर से न दोहराता,
और अपने अहंकार की चादर को त्याग देता,
तो शायद, एक और मौका मिल जाता,
जहाँ से फिर शुरू हो पाता हमारा सफ़र।
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