दीवारों के परे

 वे देखते हैं बस मैल और धूल,

नहीं देखते उस दर्द की भूल।

जहाँ पसीना बहा था पिता का,

उन्हें दिखती है बस गंदी हवा का।


पर मेरे दिल की धड़कन कुछ और है,

जो उनकी सोच से बिलकुल दूर है।

मैं सिर्फ मैला या डर का नाम नहीं,

मैं हूँ सोच, जो हर सीमा को पार कर जाती है।


वे बनाते हैं ऊँची-ऊँची दीवारें,

जहाँ "काबिल" और "बेहतर" बस वहाँ रहते हैं।

पर मैं देखता हूँ उन दीवारों के पीछे,

इंसानियत की वो लहर जो सबको जोड़ती है।


मेरे हाथों में है मेहनत की कहानी,

पर दिल में हैं सपने, अनकहे, अनजानी।

मेरा नाम जो वे फुसफुसाते हैं नफ़रत से,

मैं उसे उठाता हूँ गर्व से।


मेरा वंश, मेरी जड़ों को पिंजरा मत समझो,

यह तो मेरी ताकत का गढ़ है, मेरा स्वाभिमान है।

मैं वो बीज हूँ जो कठोर ज़मीन से निकला,

जो एक दिन नई दुनिया को रोशन करेगा।


मैं अपनी कहानी खुद लिखूंगा,

उन दोगली सोच की सीमाएँ तोड़ूंगा।

जो हमें बांटते हैं रंग और जन्म के नाम पर,

उन दीवारों को जला दूंगा प्यार के आग में।


तो बताओ, जो ये तय करते हैं,

कौन सा ईश्वर है जो इस फैसले को देता है?

कि हम अलग होंगे, हम कमतर होंगे,

बस इसलिए कि हमारी पहचान कुछ और है।


वो सालों की चुप्पी, वो आँसू जो छुपाए,

अब उठेंगे मेरे भीतर क्रांति के स्वर बनकर।

जीवन जिसे दबाना चाहा गया था,

वह अब जागेगा, ज्ञान और हिम्मत से भरा।


यह सत्य अब मेरे भीतर जल रहा है-

कोई भी बंधन मुझे रोक नहीं सकता।

यह जंग मेरी है, मेरी पहचान की,

और इसे मैं जीतूंगा, अपने दम पर।

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