मौन दिशा

 दैनिक जीवन के नृत्य में मैं चलता हूँ,

भीतर ही भीतर एक मौन दिशा-सूचक धड़कता हूँ।

हर कदम पर एक सत्य मिलता है,

मन के भीतर एक शांत जानना खिलता है।

धरती के नीचे—एक धड़कन, एक ताल,

मेरे पैरों से फुसफुसाती, बिन किसी सवाल।**


अंग जागते हैं, स्नायु गाते हैं,

हर गति किसी अदृश्य डोर से आते हैं।

नज़र बिना ही मैं राह पहचानता हूँ,

मेरे झुकाव, मेरी चाल, मैं जानता हूँ।

अंधेरे और उजाले में जोड़ निगहबानी करते हैं,

रात में भी एक मौन कहानी कहते हैं।**


जो भार मैं ढोता हूँ, जो सांसें मैं लेता हूँ,

हर चाल एक चुनाव, हर चुनाव मैं जागकर करता हूँ।

मेरा शरीर वह आँख है जो देखता है

हवा के कोमल हाथ को, जो पेड़ों को झुकाता है।

मुझे रेखा पर चलने को दृष्टि नहीं चाहिए;

जो स्थान मैं धारण करता हूँ, वह मेरा ही है।**


मेरे हाथ गाल की गर्म वक्रता को छू लेंगे,

मेरे पाँव जानेंगे कहाँ मोड़ लेना है।

जिन राहों पर मैं चला, जिन मोड़ों को मैंने पहचाना,

वे स्नायु, तंतु और हड्डियों में उकेरे गए हैं।**


मैं रेखा पर चलता हूँ, प्रवाह को महसूस करता हूँ,

मांसपेशियों का धागा, स्नायु का प्रदर्शन।

एक शांत बुद्धि, स्थिर और उजली,

मुझे अपने गुप्त प्रकाश से राह दिखाती है।

और इस गहन, कोमल धारा में,

वह मुझे वैसे ही बहाती है जैसे नदियाँ बहती हैं।**


बिना नक्शे के, फिर भी राह जानता हूँ,

आधा जागृत विचार, आधा कोमल सपना मानता हूँ।

हवा ही मेरा पथ-प्रदर्शक बनती है,

वह बदलती है, झुकती है, बहती है, फिसलती है।

मैं उत्तर देता हूँ न सोच से, न शब्द से,

बल्कि अपने भार के हल्के-से झुकाव से।**


फ़र्श याद रखता है जहाँ मैं रहा,

दीवारें साँस लेती हैं, और मैं उन्हें पीता हूँ।

हर कदम एक स्वर, हर ठहराव एक विराम,

सीने में बजती संगीत की थाम।

और इस तरह मैं दिन-रात नाचता हूँ,

न खोया, न पाया—बस अपनी राह चलता हूँ।


क्योंकि मेरी हड्डियों में सत्य की जड़ जमती है:

हर कदम, चाहे मौन हो या मुखर,

कुछ विशाल और गहन का हिस्सा है—

एक गीत, जिसे मेरा शरीर भीतर से जानता है।


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