यमुना और राधा: बारिश में दो प्रेम-कहानियाँ
जब पहली बूँद पड़े, खिड़की पर कोई धीमी-सी थाप,
मन याद करे यमुना को, उसकी साँसों में वो नमी, वो ताप।
वो आई थी तूफ़ान-सी, वो प्रेम था इक आग-सी,
हर साँस में थी उसकी चाह, और दिल में थी एक प्यास-सी।
फिर बारिश हुई धीमी, सूरज भी शरमाया,
और राधा की यादों का, इक नया सबेरा आया।
वो प्रेम था इक प्रार्थना-सा, रेशम में लिपटा हुआ,
इक शांत सा सुकून था, जैसे दूध का घूँट छुआ।
यमुना के प्रेम में, थी इक बेचैनी, इक आग,
राधा के प्रेम में, था जीवन का गहरा अनुराग।
इन दोनों के बीच मेरी, आत्मा थी नाचती,
कभी रात की स्याही में, कभी भोर में जगती।
जब भी बारिश की बूँदें, धरती को छूती हैं,
लगता है, वो उनका ही, गीत कोई गाती हैं।
ये प्रेम नहीं है, जो जलकर बुझ जाए,
ये तो वो बारिश है, जो हर साल वापस आए।
वो व्याध पतंग, जो उड़ते हैं, पंखों में उनकी नमी,
वो संदेश लेकर आते हैं, कि प्रेम कभी नहीं होता खत्म।
यमुना की याद, और राधा की परछाई,
इनकी ही बदौलत, मेरे मन में, ये बारिश है छाई।

Comments
Post a Comment