आत्म-निर्मित सुख
सोना जो हाथ में हो, या सिर पर हो कोई ताज,
दुनिया दे सकती है, ये सब दिखावटी साज़।
पर असली दौलत वो, जो मिले जब मन और काम मिलें,
जब आत्मा की पुकार, और तुम्हारे कदम हिलें।
कोई नहीं दे सकता, वो खुशी जो तुमको रास आए,
वो तो भीतर उगती है, जब दिल में सुकून समाए।
ये बनती है मेहनत से, पसंद से, और ध्यान से,
ये वो रौशनी है, जो तुम खुद जलाते हो मान से।
तुम नहीं छीन सकते, किसी और की शांति को,
पर तुम अपनी शांति को, दे सकते हो नया रूप।
कोई और नहीं देगा, अपनी कृपा का रंग,
पर तुम उस कृपा से मिल सकते हो, स्वयं अपने संग।
किसी और की आग से, नहीं मिलेगी तुम्हें गरमी,
जितनी तुम खुद जलाओगे, उतनी ही बढ़ेगी रोशनी।
और उम्मीद ये है कि, वो लौ जो तुम खोजते हो,
वो तुम्हारे ही जीवन में है, जिसे तुम रोज जीते हो।
हर एक कदम जो तुम बढ़ाओ, हर सच जो तुम मानो,
वो सितारा बन जाएगा, आसमान में उसको पहचानो।
तुम भले अकेले चलो, इस रास्ते पर,
जो खुशी तुम बनाओगे, वो तुम्हारी अपनी होगी।
तुम न उम्मीद करो, कि कोई और आएगा,
जो तुम्हारा रास्ता बनाएगा, और तुमको राह दिखाएगा।
तुम्हारे भीतर ही है वो शक्ति, जो तुम्हें उड़ाएगी,
हर डर को पीछे छोड़कर, नई मंज़िल दिखाएगी।
तुम खुद ही हो वो सूरज, जो हर सुबह निकलता है,
तुम्हारी मेहनत से ही, हर ख्वाब सच होता है।
दुनिया की भीड़ में मत खोना, अपना रास्ता खुद चुनना,
क्योंकि तुम्हारी कहानी का, हर पन्ना है तुमको बुनना।

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