विश्वास का सिलसिला

 खुली जंग में मत भरो, चमकती हुई धार पर,

यहाँ तो हर सपना धुंधला हो जाता है,

सौंदर्य की धूल पर नहीं, विश्वास की उम्मीद पर,

जो बस बिखर जाती है, जैसे टूटे हुए आइने की परछाई।


रिश्तों की नींव तो छलावा ही है,

जहाँ हर वादा एक नकाब है,

और हर रिश्ता एक सूखी झरना,

जिसकी आवाज़ बस खामोशी बनकर रह जाती है।  


यहाँ हर बंधन ज़हर का प्याला है,

और हर उम्मीद एक डर का साया,

संदेह की डोरी से बंधा हर दिल,

जैसे जंजीर में जकड़ा कोई बदसूरत सपना।  


विश्वास—यह एक रेत का महल है,

जो लहरों की तरह मिट जाता है,

एक सपना है, जो टूटते ही बह जाता है,

और फिर बस रह जाती है एक खामोशी,

जो कभी नहीं भरती अपने जख्मों को।


तो मत चलो इस राह पर,

जहाँ दिल में कोई आशा का दीप जलता नहीं,

यह दुनिया अंधेरी है, उसकी हर सच्चाई

मुँह छुपाए रहती है झूठ की परत में।  


क्योंकि यहाँ हर सुबह नई पीड़ा लाती है,

और हर शाम बस उन जख्मों को गिनने का काम है,

तो जागो, भरोसे की चादर उतार कर,

खुद को फिर से खोजो, अपने विश्वास को फिर से जियो। 

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