तूफान और मैं
जो पेड़ों से टकराती हुई गुज़र गई,
उसकी चीखें, उसके क्रोध की आवाज़ें,
आसमान को लाल कर गई, जैसे राक्षसी राग।
आसमान अंधेरा था, प्रकृति का गुस्सा दिख रहा था,
बिजली की कड़क, बिजली का मुकुट,
रात को चीरते हुए, चमकते हुए,
जैसे स्वर्ग का क्रोध पृथ्वी पर उतर आया हो।
तेज़ बारिश थी, ज़ोरदार आवाज़ थी,
बूंदें जैसे तलवारें,
धरती से टकराती हुई,
मिट्टी का सारा सुकून उड़ा कर रख दिया।
नदी पागल हो गई थी,
उसके पानी में डर भर गया था,
उसकी धारा भी कांप रही थी,
जैसे अपनी ही शक्ति से घबराई हो।
पुराने पेड़ झुक गए, पर टूटे नहीं,
उनकी जड़ें धरती में गहरी थीं,
छोटे फूल कुचल गए,
जैसे प्रकृति के सामने छोटे-छोटे प्रतिरोध।
पक्षी डरकर उड़ गए,
सुरक्षित जगह की तलाश में,
उनके पंख थक गए,
उनकी चहचहाहट खामोशी में बदल गई।
तुमने लहरों को उठाया,
तुमने मेरा घर तोड़ा,
बारिश ने मुझे पीटा,
और बिजली का मुकुट, मेरे सिर पर सजा।
सूरज और चाँद ने तुम्हें ताकत दी,
तुमने मेरी रात चुरा ली,
मेरा दिन छीन लिया,
सभी प्रकाश को अंधकार में बदल दिया।
पर उस तबाही में,
एक अजीब ताकत पैदा हुई,
जब तुमने रास्ते से पत्थर हटाए,
तो वे मेरे गुस्से के लिए एक बाधा बन गए।
तुम्हारे हर प्रहार से,
मेरी शक्ति बढ़ती गई,
मैं और भी मजबूत हुआ,
जैसे तूफान का अंत नहीं, उसकी शुरुआत हो।
हज़ारों सालों से,
मैं तुम्हारा गुस्सा देख रहा हूँ,
तुम्हारे बाढ़ और आँसू सह रहा हूँ,
तुम्हारी विनाशलीला के साक्षी बनता रहा हूँ।
पर जिस दिन तुम चले जाओगे,
उस दिन मैं भी चला जाऊँगा,
मिट्टी का सुकून फिर से लौट आएगा,
शांति का पल फिर से अपने आगोश में लेगा।
आखिर में सूरज निकला,
एक दागदार पर नई दुनिया पर,
तूफान चला गया, शांति लौट आई,
पर मुझे पता है, मेरी शांति उसी दिन आएगी,
जिस दिन यह तूफान पूरी तरह खत्म होगा—
और मेरी आत्मा फिर से स्वच्छ हो जाएगी।

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