आशय की सांसें
हवा—एक संत की सांस, एक आज़ाद रूह की फुसफुसाहट,
जो ज़मीन पर घूमती है, बिना दावा, बिना बेचैनी,
बस एक खुली हथेली में टिकी शांति की सीपी,
मुस्कुराती हुई, जैसे कोई अनजाना उपहार।
फिर, राख से जन्म लेता है एक सच,
एक पवित्र आग की चिंगारी, जलती हुई रौशनी का जज़्बा,
वह चाह जो बंद कमरे से निकलना चाहता है,
रातों की लंबी चादर को तोड़कर अपना रास्ता बनाता है।
हवा—बुझाने की नहीं, बल्कि,
उस आग के हृदय को सुनहरी सच्चाई से सहलाने वाली,
एक कोमल मार्गदर्शक, जो अपने चुने हुए रास्ते को जानता है,
डर की आग को हवा देकर, लौ को और तेज़ कर देता है।
वे मिलते हैं, एक ज्वलंत नृत्य में—
उग्र और गहरा, प्रेम की मांग करता,
जैसे नदियाँ ऊँचे पहाड़ों से मिलती हैं,
जैसे आकाश में उड़ती हैं, पंख पर पंख चढ़ाते हुए।
अंधकार में दर्दभरी आग कराहती है,
एक बच्चे की तरह, जो खोये हुए नाम के लिए रोता है,
लेकिन हवा, करुणा के साथ, उस नाज़ुक चिंगारी को संजोती है,
दर्द को वैसे ही रहने देती है, जैसे जिंदगी का हिस्सा।
आग झूठों को जला देती है—
वही झूठ, जो हमने सच मान लिया,
वही खत, जिसे संभाला पर पढ़ने की हिम्मत नहीं की,
पुरानी यादें, झूठे खाके, अधूरे प्यार—
सबकुछ जलकर रूह को आज़ाद कर देते हैं।
हवा, हर जख्म से नहीं बचाती,
यह दोस्त है, जो टूटने भी देता है,
आग को वहाँ तक जलने देता है जहां सच उजले,
और तब तक इंतज़ार करता है, जब तक रूह जाग न जाए।
तो, प्यार को एक पवित्र, उठती हुई आँधी बनने दो—
जो पुराने को झकझोर कर, नई ऊर्जा दे,
मूर्तिकार की तरह, परदे को तोड़कर,
यह जलकर एक नई कहानी छोड़ जाती है,
जिसे सुनना अभी बाकी है।
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