अंतर्मुखी शांति

 मैंने अपने वस्त्र उतारे, दुनिया के झूठे मुखौटे

कोई नक्शा नहीं, कोई मार्ग नहीं, केवल खालीपन का विस्तार।

आँखें बाहर की, पर अंदर का दृश्य अनजान,

स्व का भारी पर्दा, छुपा हुआ अनदेखा, अज्ञात।


ख्वाबों की उस धरती पर भटकता रहा,

जहाँ न मंजिल थी, न कोई राह,

वहाँ मीलों दूर, दिशाएँ चूक गईं,

और मैं था—अकेला, अनजाना, अनिर्दिष्ट।


वे पुकारते रहे, "मिल गया है रास्ता, चलो,"

फिर उंगलियाँ हिलीं, फिर पलटीं, और बस धूल में मिल गईं।

भीड़ का रंगीन मेले, क्षणिक नाटक,

गुज़र गया जैसे धुंधली सी ख्वाहिशें, फुसफुसाहटें।


मैंने पार किए दरवाज़े, जिनके पीछे कोई मंजिल नहीं,

छाया का पीछा किया, धूप में नाचते हुए—

उनकी आवाज़ें, सूखे पत्तों जैसी,

किसी स्थायी जगह का संकेत न दे सकीं।  


संदेह की कठोर आवाज़ से गहरी,

मैंने जाना—कुछ और भी है।

एक शांति, एक सच्चाई का स्वर,

जो कहता है, "सिर्फ़ रहो, बस, हो जाओ।"


कुछ खोजी रुके, उम्मीदें मलीन,

फिर भी मैं खड़ा रहा, धूल, आग, और अंधकार में—

ना प्रशंसा की भूख, न नाम का लालच,

सिर्फ़ सांस का एक शुद्ध झोंका,

जो सन्नाटे को चीरता है।  


हर कदम बाहर नहीं, बल्कि भीतर—

एक अनंत रास्ता, बिना मंजिल का,

जहाँ त्वचा के नीचे, आत्मा का विस्तार है—

वहाँ कोई सीमाएँ नहीं, कोई अंत नहीं।  


मैं कोई चित्र नहीं, कोई तस्वीर नहीं,

बल्कि प्रकाश का जाल, एक अनंत कैनवास,

रूप या छाया से नहीं,

सितारों से बुना, जो कभी न टूटे।  


मौन का एक सिहरन, एक पवित्र सिसकी,

अम्बर के नीचे, उस विशाल आकाश के तले,

न कोई खालीपन, न कोई कमी,

बल्कि वह विशालता, जो सीमा से परे है।  


मैंने सिर झुकाया, बाहर का सब कुछ त्यागा,

भीतर की नई सुबह का अनुभव पाने को,

मन शांत, दिल खुला—

वह बेचैन समुद्र, आखिर शांत हो गया।  


खोज का कोई अर्थ नहीं,

पलायन का कोई नाम नहीं,

मैं वही हूँ, वही रह गया—

वही मौन स्थान, वही स्थिरता।  


उस शांति में, धूल की परतें झर गईं,

और मैंने पाया—

असीम स्थिरता, वह स्वयं,

जो कभी न टूटे, न थके,

वही है वह आत्मा, वह प्रकाश।  

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