भूख का सच

 


गली की खामोशी में हल्की सी हिल गई परछाई,

जैसे कोई सपना जाग रहा हो फिर से,

ना हवा का शोर, ना किसी का चिल्लाना,

सिर्फ सांसों की फुसफुसाहट और दिल की धड़कनें।  


मैं एक छोटी सी गौरैया, उड़ान में तेज़,

दीवारों से टकराते हुए, अपनी दुनिया की तलाश में।

मुझे सोना-चाँदी नहीं चाहिए था,

बस एक रोटी का टुकड़ा, जीवन का आसरा।  


सड़क की भीड़ में देखा एक लड़का,

आँखों में भूख की आग, हाथ में छुपा रोटी का टुकड़ा।

हम दोनों एक जैसे थे,

भूख की चुप्पी में जुड़ गए, बिना बोले।  


उसकी आँखें मटमैली थीं, जैसे कोई पुराना गीत,

हर ख्वाब टूटा हुआ, हर उम्मीद अधूरी सी।

मैं भी उसी रास्ते पर चल रही थी,

जहाँ हर कदम पर मौत का साया था।  


मैंने सीखा, यह दुनिया ताकतवर की है,

जहाँ चाहो, वहीं से अपना भाग्य चुन लो।

कोई दिखावा नहीं, कोई चमक नहीं,

बस एक छोटी सी रोशनी, बाद में फिर अंधेरा।  


बाज़ार में, मैं उड़ती, टुकड़े इकट्ठा करती,

गिरते हुए दाने, टूटे हुए टुकड़े मेरी जीत थे।

दूर एक बाँस पर बैठा पांडा,

शांति से खा रहा था, उसकी दुनिया अलग थी।  


लोग मुझे चोर कहते, उपद्रवी, शोर मचाते,

पर उन्होंने कभी मेरी भूख नहीं समझी।

उन्होंने नहीं देखा, कैसे मैं रोज मौत के किनारे जीती,

पथराए रास्ते, सूखी गलियाँ, मेरी दुनिया।  


मेरे दिल में कभी कोई बुराई नहीं थी,

मैं बस ज़िंदा रहने का रास्ता ढूंढ रही थी।

वो लड़का भी मेरी तरह था,

शहर के बीच में एक छोटी सी आशा।  


हमारा डर, हमारा अंधेरा ही हमारा साथी था,

जहाँ कोई हमें जज नहीं करता।

उस हर रात के अंधेरों में,

छुपे रहते हैं, हम अपने ही ख्वाबों के साये।  


सीखा मैंने, जब दुनिया बड़ी ताकतवर हो,

तो जो चाहिए, वही लूट लो, अपने हक़ में।

कोई चमक नहीं, कोई दिखावा नहीं,

बस एक पल की रौशनी, फिर से अंधेरा।  


मुझे पता है, हर रात के बाद सवेरा है,

और हर अंधेरे के पीछे छुपा है उजाला।

मेरे जैसे लाखों हैं, जो जिए जा रहे हैं,

छुपे हुए, फिर भी जी रहे हैं, अपनी कहानी बना रहे हैं।  


क्योंकि असली ताकत तो, भूख से लड़ने में है,

जो हमें सिखाती है, कि हर टूटे हुए को जोड़ना है।

और जब तक है सांस, तब तक है उम्मीद,

मोहब्बत की दुनिया में, ये ही सबसे बड़ा सत्य है।

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