अपनी अनदेखी काया का अनमोल सच
मुझे अपनी इस अनदेखी काया के लिए किसी वस्त्र की ज़रूरत नहीं,
ना ही उस जंगल की, जो हरेपन में जादू सा बिखेरे,
वहाँ कोई रंग नहीं, कोई आकार नहीं,
कोई झूठी चमक नहीं, बस सच्चाई का सादा संसार है।
क्या फर्क पड़ता है, यदि मैं बदसूरत होता?
सौंदर्य तो पल भर का भ्रम है, मानव की झूठी बकवास,
जैसे गिरते पेड़ की दूर की गूंज,
जो समझ को अनसुना कर, पुकार को बहरी बना दे।
उन सबके लिए जो कृपा और गर्व चाहते हैं,
वे क्षणभंगुर लहरें हैं, फुसफुसाहट की तरह,
मेरा नंगा सच, यदि कोई आकार होता,
तो वह पत्थर से भी अधिक स्थिर और सच्चा होता।
सुंदरता क्या है, सिर्फ दिखावे का मुखौटा?
जब सच्चा सार ही एकमात्र चमक है,
तो मुझे, उस सार में, सरल और साफ रहना है,
पोशाक की खुशी से ऊपर, झूठे दाग से परे।
हमारे फटे-पुराने कपड़े, ये धागों का जाल,
क्या तुम्हारा गर्व इनसे खराब होता है?
सोचो, यदि तुम्हें परवाह है, तो,
ये कपड़े, जो कचरे से निकले, दर्द से भीगे,
आँसुओं के नमक से सने, मेहनत की मिट्टी में गड़े—
क्या ये तुम्हारे मीनारों का खतरा हैं?
यह जीवन है—यह अस्तित्व का सख्त आग्रह—
हमारे दिलों में छुपे झूठों को,
क्यों तुम नहीं देखते?
तुम हमारे फटे-पुराने वस्त्र का मज़ाक उड़ाते हो,
हर दर्द को अनदेखा कर,
अपने रंगीन दिखावे में खोए हो।
तुम ही तो हो, जो हमारे भेस को पहनते हो,
मज़ाक उड़ाने में, अपने मज़े लेते हो,
जंगल से उसका चोगा छीनकर,
उसे प्रगति का नाम देते हो,
अंतिम, भव्य प्रहार के रूप में।
अपने दिलों में दबे झूठों को छुपाने के लिए,
तुम्हें कपड़ों की ज़रूरत नहीं,
वे कोई ईमानदार हिस्सा नहीं,
बस झूठ का आवरण हैं, अपनी जरूरत का जामा।
तुम ही हो, जो हमारी गरिमा का मज़ाक उड़ाते हो,
हमारे फटे-पुराने वस्त्रों का उपहास उड़ाते हो,
और अपने रंगीन झूठों में सजी हो,
मगर ये कपड़े, ये खिंचे-टूٹے, हमारी असली पहचान हैं।
कोई दाग नहीं, कोई धोखा नहीं, कोई भेस नहीं,
वे हमारी सच्चाई का प्रतिबिंब हैं—
जो तुम्हारे गर्व को खलल नहीं डालते,
बल्कि तुम्हारे झूठों की परछाई को उजागर करते हैं।
तुम्हारी मुस्कान में, जो इतनी शुद्ध और चमकीली लगती है,
क्या उस चमक के पीछे कोई अंधेरा नहीं है?
क्या तुम्हारे झूठ, तुम्हारा दिखावा,
हमारे नंगे सच के सामने, अधिक घृणित नहीं हैं?
हमारे फटे-पुराने वस्त्र, पसीने से भीगे,
सच्चाई के गीत गाते हैं—
उनकी हर सिलाई, हर धागा,
उन दर्द भरे स्वर, उन बोझों का साक्ष्य हैं,
जो दबे-कुचले और बंधे हुए हैं।
क्या है तुम्हारे भव्य वस्त्रों में?
खोखला घमंड, दिखावा,
और एक खौफनाक पाखंड,
बंजर, खाली जगह—जहाँ कभी ताकतवर पेड़ खड़े थे!
हर रंग में, तुमने विभाजन की शक्ति रची,
हर कपड़े में, बदहाली की लकीरें खींचीं,
मगर यही जान लो, अपनी पूरी ताकत से:
तुम्हारे रंग और कपड़े, हमारी आत्मा की असली रोशनी को नहीं छुपाएँगे।
हमारा सच, इस धरती की तरह, मजबूत, स्थिर और गहरा है।
तुम्हारे झूठ और भेस, हमारी आत्मा को रुला नहीं सकते,
और न ही, हमारे सार को बदसूरत बना सकते हैं।
हम अपनी सच्चाई की वाणी को कायम रखेंगे,
जैसे जंगल की गहरी आहें, धीमे और मौलिक।
प्रकृति की समझ, जो तुम्हारे जल्दबाज़ दिल नहीं जानता,
आवाज़ बनकर, हमें सही रास्ता दिखाएगी।
क्या अब, तुम सुनोगे—
प्रकृति की सलाह, आखिरी सांस की फुसफुसाहट में?
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