खामोश निशानियाँ
बरसों बाद तुम्हें देखा, कुछ भीतर फिर जागा।
स्मृति का दीप जला मन में, यह पल कितना भागा।
चुप होती हैं अब पीड़ाएँ, पर वो वक़्त पुराना।
दिल की तह में बहता था, दुख का राग सुहाना।
सपनों में जो कोमल था, अब छाया बन जाता।
वक़्त की धूलों में खोकर, कुछ कह कर रह जाता।
हम पर छूटी हैं छायाएँ, बीते घाव पुराने।
कुछ तो अब भी बोल रहे, बिन बोले अफ़साने।
तन ने सीखा छोड़ देना, जो बोझ भरा भारी।
दर्द बना अब नाम तेरा, मन पर लेख उभारी।
हृदय पुराने ज़ख्मों को, भीतर ही रखता है।
हड्डी में जो चुप बैठा, वह भी कुछ कहता है।
आत्मा अपनी थरथर सी, बोझ सँभाल रही है।
तेरे जाने की पीड़ा को, मौन पाल रही है।
जो टूटा था फिर जुड़ा है, आँसू अब न बहते।
कोमलता अब रोती नहीं, बस मौन बुनते रहते।
धीरे-धीरे चलना सीखा, संयम साथ लिए हैं।
कहाँ दबे हैं टूटेपन, ये हाथ जानते हैं।
शब्दों से हम चुप रहते, पर भावों से बहते।
तेरा दुख अब मेरा भी है, हम साथ-साथ रहते।
दया नहीं बस पीड़ा में, वह स्मृति की थाती।
जैसे कोमल मरहम बन, कोई पीड़ा छाती।
प्रेम की पीड़ा को समझें, पर ना रो लें उसकी।
यही दुआ है मन से अब, बात करें हम सच्ची।
घाव रहें पर प्रेम जिए, ये सौगंध हमारी।
तेरा मेरा त्याग ही अब, श्रद्धा की बलिहारी।
हर चिह्न हमें स्मरण कराए, जो तुझसे पाया है।
रातों का वह मौन अभी, मन में साया है।
घाव भले ही मिट जाएँ, पर दीप जले भीतर।
प्रेम रहे उजियारा सा, कोमल, शांत, अमर।

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