स्पर्श की राख
एक स्पर्श का ताना-बाना, एक धीमी पुकार
जहाँ प्रेम के घाव जंगली फूलों-से खिलते हैं,
जैसे बरसात की पहली बूँद में काँपते होंठ—
मगर चिंगारी की तरह, क्षण भर में बुझ जाते।
तेरी फुसफुसाहटें गर्म लू की तरह
मेरी त्वचा पर चलतीं,
झूमते पेड़ों की ओट में
राज़ों को हवा संग उड़ातीं।
तेरी हँसी—जैसे किसी पुराने आँगन में
घुँघरुओं की मीठी झंकार,
मेरे भीतर तक उतर जाती।
छोटे-छोटे दर्द, जैसे काँच के बारीक टुकड़े,
मेरी हथेलियों में चुभते।
टूटे वादों के काँटे,
इस नाज़ुक जगह पर
अदृश्य लकीरें खींच जाते।
तेरी साँसें, मेरे सीने की धड़कन के साथ
एक अदृश्य गीत बुनतीं,
पसीने की बूँदें—एक ऐसी आग में चमकतीं
जिसका कोई नाम नहीं।
चाँदनी में तेरी कमर का धीमा घुमाव,
जैसे कोई प्राचीन अनुष्ठान दोहराया जा रहा हो।
थकान भी तेरे आलिंगन में
एक मधुर समर्पण बन जाती।
तारों के नीचे
हम अब भी चमकते रहते—
जब तक कि
सन्नाटा हमें घेरे न ले।
मगर फिर लौट आती है शर्म—
अँधेरे में चमकती हुई,
जैसे अंगार में बची आख़िरी गर्मी।
पछतावा, रात के फूल की तरह,
धीरे-धीरे मेरी साँसों में फैल जाता।
आँसू—काँच के बिखरे टुकड़ों-से,
समय के साथ फिसल जाते।
सुबह की रौशनी में
तेरा भूत अब भी मेरी आँखों में टिक जाता।
मैं फिर लौटता हूँ उसी अनुष्ठान में—
नहाया हुआ, नंगा,
तेरा नाम फुसफुसाते हुए।
भाप मेरे चारों ओर घूमती है,
जैसे तेरे हाथ फिर से
मुझे आग बना सकते हों।
कॉफ़ी का गाढ़ा, धीमा बहना—
उस सन्नाटे में जिसमें
सिर्फ मैं और तेरी अनुपस्थिति रहते हैं।
तेरी खाली कुर्सी,
फिर भी मेरी नज़रों में
तेरा वही पुराना, कोमल देखना।
खरोंचें अब भी लाल कलाकारी की तरह खिली हैं,
मेरे दिल पर बने हल्के नक्षत्रों-सी।
छोटे, सच्चे निशान—
कि मैं कभी तेरा था।
तो बता…
तू जिसने हर स्पर्श में मुझे थामा,
मेरे होंठों पर अपना नाम लिख दिया—
तू कैसे चला गया बिना कोई निशान छोड़े?
तू, जिसने मुझसे इतना प्यार किया था,
मुझे यूँ खाली कैसे छोड़ गया?
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