एक परछाई सी चलती है मेरे साथ
एक परछाई साथ चलती है मेरे मन के भीतर,
थोड़ी ठंडी, चुप-चाप, जैसे रात की कहर।
डर की फुसफुसाहट कहती है धीरे-धीरे,
“यहीं रुको, मत जाओ उस अंधेरे घेरे।”
उसकी आवाज़ हड्डियों तक उतरती है गहराई,
सावधानी की सीख देती, पर न कोई परछाई।
रोकती है कदमों को, बांधती है सोचों को,
धुंधले साये में खो जाता हर मोड़ हो।
पर मैं सुनता हूँ उस डर की आवाज़ को,
पर मानता नहीं, पहचानता हृदय की बातों को।
मैं पंछी हूँ जो चट्टान के पार उड़ता है,
हर भय को नींद में मीठा सुला देता है।
सीमा है दहलीज़ नयी कहानी की,
कोशिशों की उड़ान, उम्मीदों की रवानी की।
मैं बढ़ता हूँ साहस से, भरे मन के उजाले,
जहाँ मेरा सवेरा है, वहाँ हों घने अंधियारे।
जब डर कांपते हाथों से राह दिखाए,
मैं चुनूँगा अपना रास्ता, मैं खुद बताएँ।
मैं भोर हूँ जो रात का सन्नाटा चीरती,
रौशनी हूँ जो हर ज़ंजीर को खोलती।

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