वह अनसुना नायक


शहर की भीड़ में, तेज़ कदमों के बीच,

जहाँ हर आवाज़ है तैरती अधरों पर,

मैंने देखा एक शख़्स, जो खड़ा था स्थिर,

एक रेलवे का नौकर, एक सरल मार्गदर्शक।


उसका चेहरा, धूप और बारिश की छाप,

जीवन की थकान में भी एक अटल आग।

आंखों में वो चमक, जो कहती है अनकही बात,

कहानियाँ जो शब्दों में बयां न हो सकीं।


उसकी पीठ पर बोझ है, सिर्फ सामान नहीं,

सपनों का भार, आशाओं की गठरी भी।

मांस-पेशियों में छुपा है संघर्ष का इतिहास,

चुपचाप वह सहता है ज़िन्दगी की कसक।


धूप में तपती राहों पर, बारिश की नमी में,

चलता है वह बिना किसी शोर के,

हर कदम उसके एक लय है, हर साँस है कहानी,

जो बताती है रोज़मर्रा की जिजीविषा।


वह पुल है ताक़त का, नाज़ुक भी अपनी तरह,

दूर-दूर की दुनिया को घर से जोड़ता है।

कंधे झुके हैं, पर हिम्मत अडिग है,

उसमें छुपी है एक अनमोल शांति।


उसकी लाल कमीज़, थकी हुई पर गर्व से भरी,

गरिमा की निशानी, बिना शब्दों के भी।

थकी आंखों में जलती एक धीमी लौ,

जो कहती है उसकी पहचान का राज़।


उसके कदमों के निशान, सपनों की स्याही,

मेहनत की किताब के पन्ने हैं वो।

वो नायक जिसे कोई गान नहीं सुनाता,

पर उसकी ताक़त है शहर की धड़कन।


उसके हाथों में छुपा है एक संसार,

दर्द और उम्मीदों का सम्मिश्रण।

हर टाँग पर एक कहानी, हर साँस में एक वादा,

कि वह हार नहीं मानेगा कभी भी।


थोड़े सिक्के, कुछ पल की राहत,

छोटी-छोटी खुशियाँ, जीवन के उपहार।

वह सिर झुका कर स्वीकार करता है,

पर उसकी आत्मा है बुलंद, अडिग।


रात जब आती है, थकान जब छा जाती है,

डरता है उस सुबह से, जो अंतिम हो।

ना केवल मेहनत का अंत, बल्कि आशा का भी,

जो भीतर गहराई से जलती है।


फिर भी चलता है वह, धीरज के साथ,

चेहरे पर जंग की लकीरें साफ़।

उसका जीवन एक मूक संघर्ष है,

जो हर रोज़ जीता है, हर रोज़ निभाता है।


जब भी देखूँ उसे, मैं देखता हूँ आत्मा,

जो कभी टूटने नहीं पाती, कभी झुकती नहीं।

वह अनसुना नायक, बिना किसी नाम के,

जो हर कदम में देता है जीवन का प्रण।


याद रखो उसे, शोर से दूर,

उसकी मूक ताक़त, उसकी स्थिरता को।

जो दिखाती है कि असली बहादुरी है,

जीवन की साधारण राह में।

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