यादों की बांसुरी

 तुम्हारी यादों का गीत बजता है मेरी बांसुरी में,

हवा में तरंगें बनकर, खेतों में सिहर जाती हैं।

कहीं दूर गोवर्धन की पहाड़ियों से तुम हो दूर,

फिर भी मेरे मन का हर कोना तुम्हारे ही रंग में रंगा है।  


जब सोचता हूँ तुम्हें, तो मन में छवि बनती है,

यमुना के किनारे बैठी थी वो शाम,

जहाँ हमने हाथ थामे बैठे थे, समय ठहरा था।

आसमान विशाल, शांत धरती, और तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा,

जिसे सुनते थे केवल मेरे सुर, जैसे मधुर कोई राग।  


तुम्हारा नाम, जो कभी मुख से नहीं निकला,

हवा में फुसफुसाता है, पत्तियों को सुनाता है।

पेड़, घास, और झुका हुआ दुधमुंहा बैल,

सब तुम्हारी बात ही कर रहे हैं।  


गायें धीरे-धीरे घुमती हैं,

उनके गले में झूलते घंटियाँ, जैसे पुरानी खुशियों की झंकार।

मेरा बांसुरी फिर से गुनगुनाता है,

उस शांत जंगल में, एक सुनहरी खामोशी छाई है।  


मैं बैठा हूँ उस वट वृक्ष के नीचे,

जिसकी छाया में स्मृतियों का बसेरा है।

बादल धीरे-धीरे आकाश में घूमते हैं,

और हर विचार तुम्हारी ओर ही लौटते हैं।  


शाम की रीत में, जब सूरज ढलने को है,

मुझे महसूस होता है तुम्हारी मुस्कान भीतर से उभरती है।

हर सुर, हर सांस, एक प्रार्थना है,

कभी तो लौट आओ, इस दिल की पुकार सुनो।  


और उस शांति में, मेरी सोच फिर तुम्हारे पास चली जाती है,

मृदुल यादों की बूंदों में, जैसे ओस की बूँदें घास पर गिरती हैं,

और गायें सुन रही हैं, पहाड़ भी याद कर रहे हैं,

तुम्हारी प्रेम कहानी, अनंत काल तक।

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