जीवन की बाज़ी

 सोने के सिक्कों से नहीं, साँसों से दाँव लगा,

कहानी का धागा थामा, किस्मत का साथ जगा।

राजा हो या साधारण जन, या हो कोई अरमान,

सच की तलाश में सबने किया, जीवन पर बलिदान।

पहली बाज़ी तब लगती है जब पहली साँस आती,

भविष्य की अनदेखी राह हमें चुपके से ले जाती।


हम जवानी दे देते हैं प्रेम की अनजानी राह,

दिल को सौंप देते हैं एक क्षणिक, मधुर परवाह।

सपनों पर वर्षों का दाँव, न जाने टिकें या टूटें,

आशा के पासे फेंकते हैं, जो भविष्य में छूटें।

जब विश्वास किसी पर बिखर कर धूल हो जाता है,

आख़िरी दाँव तब भी मन चुपचाप लगाता है —

कि जब सब मिट जाए, जब खेल ख़त्म हो जाए,

मृत्यु ही सच बनकर हमारे सामने आए।


तो किस पर लगाएँ अपना विश्वास, अपनी आस?

ना शोहरत पर, जो पलभर में हो जाए उदास।

ना पत्थर पर खुदे नाम, जो समय मिटा दे,

ना आसान राह, जो हमें अकेला बना दे।

दाँव लगाएँ उस साहस पर, जो चेहरे पर चमके,

उस दिल पर, जो इस पल की धड़कनों में धड़के।

ये फ़ैसला आत्मा की गहराइयों में पनपता,

जहाँ बिखरे टुकड़ों से पूरा जीवन बनता।


किससे लड़ें? न भीड़ से, न बाहरी शत्रु से,

बल्कि उन अँधेरों से, जो उठें अपने ही मनु से।

उन डर से, जो नाज़ुक त्वचा के नीचे छुपे,

उन पछतावों से, जहाँ हमारी कमियाँ लुप्त हों दबे।

यही हैं असली दुश्मन, जिन्हें हराना ज़रूरी,

ताकि मिले मन को शांति, और समय में दूरी।

वो मौन लज्जा, जो कहे — “तुम यहाँ के नहीं”,

वो कड़वा सुर, जो हमारे गीत को तोड़ दे यहीं।

सबसे बड़ी लड़ाई है उस झूठी आवाज़ से,

जो कहे हमें हार मानो, जीत दूर है आज़ से।


इस सच्ची, नग्न और ईमानदार बाज़ी में,

बस एक ही इनाम है — अपने आप होना ज़मीं पे।

अपनी ही मुश्किलों पर पाना विजय महान,

और आशा की लौ को रखना हर पल प्राण।

इतनी ताक़त पाना कि डटकर खड़े रह सकें,

दिल, हाथ और पाँव में सुकून ढूँढ सकें।

क्योंकि जीवन है दाँव, साहसिक और न्यारा,

जहाँ बस साँस लेकर, यहीं और अभी रहना है प्यारा।

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