घोड़े की चाल, मन की चाल

विचार बिखरते हवा संग जैसे,

पत्ते उड़ें राह में वैसे।

लगाम थामे, मन को साधूँ,

सहज प्रवृत्ति को रुकने बाधूँ।

हम दोनों का नृत्य निराला,

हर उछाल में प्रश्न छुपा भाला।


राह पुरानी, मन को टटोलूँ,

क्यों हर क्षण में सोचें, डोलूँ?

हरी-पीली दुनिया भागे,

मन भटके तो लगाम भी जागे।

क्या ये मौन इशारा घोड़े को समझ आता है?

या बस धड़कनों में बह जाता है?


खुरों की गड़गड़ाहट गहरी,

पर मेरे भीतर शोर है ठहरी।

पेड़ दिखते, दृष्टि है खाली,

पीछे की आहट सुनाई न डाली।

यात्रा में क्या है ऐसा छिपा,

जो मन को चैन से न जपता?

क्या ये उम्मीदों का बोझ पुराना,

या अस्तित्व का भार सुहाना?


सफ़र लंबा, नदी सा बहता,

हर मोड़ मुझे दूर ही कहता।

मंज़िल धुंधली, नज़र में नहीं,

परछाइयों का पीछा सही।

पीछे छूटे फुसफुस सुर,

आगे कल की धड़कन भर।


कहाँ जा रहा हूँ इस सवारी में?

कौन है साथी इस प्यारी में?

क्षितिज कहे—“आओ पास”,

या ये बस नियंत्रण का वास?

क्या मैं सवार या भटका साया,

जंगली दौड़ में ख़ुद को पाया?

हवा में सवाल उकेरूँ रोज़,

अपने ही विचारों की धूल को खोज।


लगाम है जैसे नाज़ुक डोरी,

बाँधे मुझे, कहे कोई गोरी।

क्या मेरा स्पर्श कह देता ज़्यादा,

या मैं बस किस्मत का प्यादा?

राह मरोड़े मन की डोरी,

दूर कोई आकृति, वादा चोरी।


उत्तर मुझसे खेल करे,

सूरज ढले, परछाईं धरे।

सिर्फ खुरों की खनक सुनूँ,

और बीते विचारों को चुनूँ।

एकांत में जब लगाम कसूँ,

घोड़े की ताक़त को महसूस करूँ।

हम दोनों बढ़ते रहस्य में,

तलाश उसी अन्वेषण में।

सुनना सीखूँ, सिर्फ चाल नहीं,

बल्कि दिल की धड़कन की पाल नहीं।


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