कामिनी नदी में वादा


 बरसत बूंद नीर झर झर रे,

तन मन सींच, सुधा भर भर रे।

कामिनी धारा मंद मुसाई,

बीते दिन की कथा सुनाई।


पानी में छवि पुरानी झलके,

गीत अनजाने मन में पलके।

अवसर आ पहुँचा मन बोला,

जैसे दीपक तम को खोला।


पार खड़ा घाट जर्जर भारी,

टूटी सी साँस, थकी फटकारी।

धुंध भरे पथ विश्वास दिखावे,

दूर कहीं सच्चा प्रकाश बुलावे।


गाँव कहे वह ऋतु में खोई,

ज्यों ओस बूँद ज्वाला में रोई।

नाम सुनूँ मंद पवन में प्यारे,

“श्रील” गूँजे प्राण हमारे।


धूल भरे आँगन में नाची,

पग नंगे लय की रेखा खींची।

हँसी उसकी धूप-सी छाई,

अब बस कथा, स्मृति में समाई।


किन्तु वाणी उसकी मैं सुनता,

नदी साँस सपनों में चुनता।

मूसलधार में नाव उभर आई,

स्मृतियों ने मृदु तान सजाई।


डोंगा छोटा, धुंध चीर लाया,

बूढ़ा खेवन शिल्प दिखलाया।

और वहाँ वह खड़ी हमारे,

मानो जुदा न हुई किनारे।


आँखें वही, पर रूप निखारा,

मौन खड़ी, पत्थर का धारा।

मन में “श्रील” पुकार उठाई,

पग नंगे जैसे कल आई।


“पार चलें?” उसने जल से पूछा,

सिर हिलाया, शब्द न बूझा।

“लगा कि तुम खो गई कहीं री,”

“गई थी—पर नदी स्मरण धरी।”


टोकरा मछली, कासावा, लायी,

नाव में रख, दृष्टि मिलायी।

बूढ़ा खेवन चुप ही रहा रे,

जैसे कथा पुरानी कह रहा रे।


नाव चली, पार दूर दिखा रे,

बारिस धार बहत सब लिखा रे।

मौन मिलन में लय बह जाती,

नदी गीत जीवन भर गाती।**


किनारे धुँधले, समय थमा सा,

पल वह अनन्त, नभ में जमा सा।

बरसत बूंद नीर झर झर रे,

तन मन सींच, प्रणय सुधा भर भर रे।


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