जागो, अपनी आवाज़ बनो"

 


अँधेरी रात में तारे टूटने का इंतज़ार क्यों?

क्यों हम उस ख्वाब की उम्मीद में बैठे हैं,

जो चकनाचूर हो चुका है, गिर चुका है धरती पर?

राहें क्यों देखी जाएं, जब हर सपना झूठा साबित हो चुका है,

जब मंजिलें धुंधली पड़ चुकी हैं, और उम्मीदें खुमारी में डूब चुकी हैं?  


पहली उस दरार पर ही, जागना होगा हमें,

उससे पहले कि मिट्टी में मिल जाए हमारा वजूद,

जब तक हौसले की लौ बुझ न जाए,

और दर्द की आंधी हमारी पहचान न मिटा दे।  


जब हर आहट पर मन की नींद टूटती नहीं,

और किसी की चीख हमें नहीं जगाती,

तब नियति का क्रूर खेल शुरू होता है,

जब मासूमियत का शव, उसकी दुनिया को उजाड़ देता है।  


हर लापरवाही एक खाई को जन्म देती है,

जहाँ उम्मीदें खामोशी में गुम हो जाती हैं,

क्यों हम अपनी आवाज़ को खामोशी का आवरण बनाते रहें,

जब हमारी आवाज़ ही है, जो हर स्याही को रंगीन कर सकती है?  


जागो! यही हमारा धर्म है, यही हमारा कर्म है—

अपनी धरती को फिर से हरा-भरा करने का समय है।

किसी और के फैसले का इंतज़ार क्यों करें,

जब हमारी खामोशी ही अपराध का गुनाह बन जाती है?  


उठो, बोलो, और अपने हक़ की आवाज़ बनो—

क्योंकि सिर्फ़ जागरूकता ही है, जो अँधेरे को चीर सकती है।

यह हमारा कर्तव्य है, यह हमारा संकल्प है—

एक नई सुबह का आगाज़ करने का,

जहाँ हर दिल जागरूक और हर सपना सच्चा हो।  

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