अपनी आस्था, अपनी पहचान
जब मन को तोड़ा जाए,
तो वह दीपक बुझ जाता है—
कहीं दूर, कहीं छिप जाता है।
धर्म जब ज़बरदस्ती दिया जाए,
तो यह नहीं होता अपनापन,
बल्कि बन जाता है एक पिंजरा,
जहाँ उम्मीदें भी दम तोड़ती हैं।
हमारे पूर्वजों ने जो राह दिखाई,
वो प्रेम और आज़ादी की थी।
उनकी लड़ाई थी खुद की पहचान की,
न कि किसी के जबरदस्त हुकूमत की।
आस्था होनी चाहिए दिल से,
खुले आसमान की तरह।
ना होनी चाहिए बंदिशों में,
ना बननी चाहिए कोई बंधन।
जो मजबूरी से मन बदले,
उसमें होती है एक पीड़ा,
एक तन्हा कर देने वाली चुभन,
जो कभी पूरी न हो सके।
संस्कृति, परंपरा, और विश्वास—
सबके हैं अपने रंग और सुर।
इन्हें न मिटाओ, न दबाओ,
बल्कि समझो और अपनाओ।
जब हम दूसरों की आस्था का सम्मान करते हैं,
तब ही हमारी अपनी आस्था मजबूत होती है।
रिश्ते बनते हैं, पुल बनते हैं,
और ज़मीन बनती है प्यार की।
इसलिए चुनो अपनी आस्था खुद,
अपने मन की सुनो आवाज़।
मजबूरी नहीं, प्यार से जोड़े,
ऐसा हो जीवन का सच्चा राज़।

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