तुम अपनी आग हो
तुम अपनी आग हो, अनवरत जलती ज्वाला,
तेरी उम्र की तारीफों में छुपी है एक खामोशी का माला।
आँखों में खेलता था सपना, मुस्कुराहट की झलक,
सोचा प्यार का मेल है, ये दिल का हल्का सा झंकार।
मगर उन तारीफों के पीछे छुपा था साया,
जो धीरे-धीरे तुम्हारी रूह को खाली कर जाएगा,
वह मीठी बातों का जाल, वह ठंडी हथेलियों का दस्तूर,
जो मुखौटा गिरते ही, छोड़ जाते हैं खालीपन का सूर।
कुछ महिलाएँ प्रतिबंधित नहीं, ना ही अपने वजूद को बेचती हैं,
मगर कुछ ऐसी हैं जो अपने आत्मा का सौदा कर जाती हैं,
खुद को खोखला बनाकर, भीड़ में अपनी पहचान खो देती हैं,
उनके भीतर की आग बुझ जाती है, और बस रह जाती है खामोशी।
प्यारी बहन, तुम आग हो, अपनी ही रौशनी,
तुम्हारी कीमत इन दिखावटी तारीफों से कहीं अधिक है,
अपनी मुस्कुराहट को किसी के लिए व्यर्थ मत करो,
जो आज तुम्हें रानी कहेगा, कल तुम्हें छोड़ जाएगा।
वे तुम्हारे प्यार को याद नहीं रखेंगे,
वे तुम्हारी अच्छाइयों को नहीं, बल्कि तुम्हारी कमियों को गिनेंगे,
वह तुम्हें तब छोड़ जाएंगे, जब तुम्हारी ज़रूरत होगी,
यह दुनिया का सच है, यह हर बार तुम्हें बताएगा।
तो जब कोई प्यार का दिखावा करे, उससे पूछना,
क्या यह तूफ़ानों में भी टिक पाएगा,
क्या यह आग कभी बुझ जाएगी, या सिर्फ़ दिखावा है,
तुम अपनी शान से जियो, अपनी रोशनी बनो,
तुम्हें किसी और की आग की ज़रूरत नहीं है।
जब यह सफ़र खत्म हो, तुम्हें सुकून मिलेगा,
यह सोचकर कि तुमने दिया, पर कभी माँगा नहीं,
तुम्हें अपनी कीमत का पता है, तुम्हें किसी और की ज़रूरत नहीं,
तुम अपनी पहचान से ही पूरी हो, तुम्हें कोई और नहीं चाहिए।
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