उगता सवेरा

 

स्वयं रचित दीवारों की छाया में हूँ,

आशा और भय का मौन संग्राम ज्यों।

भीतर की लौ अब मद्धम पड़ती है,

दर्द की परछाईं में चिंगारी जलती है।


सवेरा एक सपना है जो दूर बहुत,

शर्म के स्वर हर उम्मीद को लूट।

निराशा का भार दिल को तोड़े,

साँस की तलाश में मन भी रोए।


फिर भी उस खालीपन में आशा बची,

धीमे स्वर में कोई उम्मीद सजी।

कँपकँपाती लौ, सर्द रातों की बात,

प्रकाश की प्रतीक्षा में रहती सौगात।


इस अंधेरे में भी जीवन चलता,

एक कहानी अब भी बनती, पलता।

रात चाहे जितनी भी लंबी हो,

उजाले की दस्तक निश्चित हो।


हर भय, हर पीड़ा का है संदेश,

नव आरंभ का ये पहला वेश।

टूटा दिल फिर भी धड़कता है,

कृपा की सुबह को वह तकता है।


तो सह लेना खामोशी का भार,

दर्द में भी सम्भाले अपना प्यार।

हर आँसू, हर कसक में छिपा उजास,

तू ही बनेगा अपनी सुबह का प्रकाश।

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