नेतृत्व की निशब्द चाल


पेड़ों की सरसराहट के नीचे,

जहाँ छायाएँ लहरों-सी बहती हैं,

मैंने नेतृत्व को उगते देखा-

न शोर में, न ताज में,

न ऊँची आवाज़ में, न भीड़ के बीच।


वह मिट्टी की गोद से जन्मा था,

जड़ों की तरह, चुपचाप, गहराई में।

जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजतीं,

कोई मंच नहीं सजा होता,

सिर्फ़ सेवा होती है-निशब्द, निस्वार्थ।


मैंने एक चींटी को देखा,

चावल के दाने जितनी छोटी,

पर उसकी चाल में थी स्पष्टता,

जैसे हवा में उसकी मौजूदगी ही

दूसरों के लिए एक संकेत हो-

“रास्ता यही है।”


कोई भाषण नहीं, कोई झंडा नहीं,

सिर्फ़ कदम दर कदम आगे बढ़ना,

सुगंध की एक हल्की-सी लकीर छोड़ते हुए,

जो दूसरों के लिए बन जाए एक पुल।


धीरे-धीरे औरों ने पीछा किया,

पगडंडी बनी एक रेखा,

रेखा बनी एक जीवनधारा,

और जीवनधारा बन गई एक साँझी धड़कन।


तभी मुझे ज्ञात हुआ-

नेतृत्व का अर्थ है,

एक की हिम्मत से अनेकों का जागना।

एक सपना जो क्षितिज पार पहुँचता है,

एक प्रयास जो असंभव को संभव बनाता है।


चींटियाँ सिखा जाती हैं-

नेतृत्व पद नहीं होता,

वह तो होता है विश्वास, सहयोग और निरंतर कर्म।

वह भविष्य रचता है,

वह दूरी मिटाता है,

वह सबको साथ लेकर चलता है।


और जब शिखर आता है,

तो कोई एक नहीं खड़ा होता ऊपर,

बल्कि एक पूरा समूह होता है-

जो साथ चला, साथ झेला,

और साथ ऊँचाई तक पहुँचा।


मैं अब भी देख रहा हूँ,

और सीख रहा हूँ-

क्योंकि सत्य उतना ही सरल है

जितनी उन चींटियों की थकनरहित चाल:

सच्चा नेतृत्व चुपचाप उगता है,

पर उसमें दुनिया बदलने की शक्ति होती है।

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