अँधेरे का रखवाला

 


क्या तुमने मुझे चोर कहा, तेज़ और चालाक,

रात की चादर में छुपा, एक ख्वाब सा मक्कार।

मैं तो बस एक परछाई, एक मुस्कान का साया,

जो गुजर जाता है, बिना किसी निशान के, बिना कोई माया।  


तुमने देखा नहीं, वो चुपके से चलता,

वो हवा का झोंका, वो जमीं का हल्का सा हिलना।

मैं नहीं कोई बड़ा साहस, बस एक छोटी सी आहट,

जो कह जाती है कि रात भी एक कहानी है, जिसमें सब है एक साथ।  


मुट्ठी में दबे प्यार का टुकड़ा, भूखे बच्चे का सपना,

छोटी-छोटी खुशियों का जश्न, अनसुना, अनकहा, फिर भी गहरा।

तुम पत्थर फेंको, पर मैं तो बस मुस्कुराता रहूंगा,

क्योंकि परछाईयाँ ही हैं, जो हर सच्चाई का साक्षी बनती हैं।  


वे कहते हैं, अंधेरा डरावना है, पर मुझे पता है,

यह तो सिर्फ़ एक सुराग है, एक खामोशी का संगीत।

शक्ति के शिखर पर बैठे लोग सोते हैं,

और मैं, खामोशी का रक्षक, उन्हें जागने नहीं देता।  


मैं नहीं कोई राजा, न ही कोई चोर,

मैं तो बस उन खामोशियों का परिचायक हूँ,

जो अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं,

उन कहानियों का गवाह हूँ, जो शब्दों से नहीं कही जातीं।  


वो अंधेरा, जो तुम्हें डराता है,

वह तो मेरे भीतर का प्रकाश है,

जो कभी नहीं बुझता, कभी नहीं मरता,

बस एक छोटी सी झलक, एक अनकही बात।  


मैं वह स्याही हूँ, जो कविता में डूब जाती है,

वह धुंधली सी परछाई, जो हर रात को सजाती है।

मैं वो शांति हूँ, जो शोर के बीच भी सुनाई देती है,

मैं उस खामोशी का गीत हूँ, जो हर दिल को छू जाती है।  


तो तुम मुझे जो कहो, चाहे भूत कहो या परछाई,

मैं तो बस एक सच्चाई का रहस्य हूँ,

जो रात के साथ चलता है, और सुबह की पहली किरण में खो जाता है।

मैं हूँ वह, जो दिखता नहीं, पर महसूस किया जाता है,

अंधेरे का सबसे वफादार रखवाला।  


क्योंकि असली शक्ति तो वहीं है,

जहाँ शब्दों का कोई वजूद नहीं,

जहाँ केवल एहसास की भाषा बोलती है,

और मैं, उस अनकहे का पहरेदार,

रहता हूँ हमेशा, उस सच्चाई के सामने।

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