अंतर्मन की लपटें

मेरी आँखें-जैसे बुझती हुई आग के अंगारे,

नदी-सी बहकर आईं वे, नम, बेसहारा आँसुओं के सहारे।

हर एक पल उनमें छिपा, दर्द की वो अनकही दास्ताँ,

जैसे टूटे काँच के टुकड़े, जो चुभते रहते हैं ज़माना।


एक बार था प्यार, पवित्र और निर्मल,

अब रह गया बस जर्जर, टूटे हुए सपनों का मलबा।

क्या वो था झूठ, छिपा सांप की तरह घातक,

या वो बंदिशें जो तोड़ी नहीं जा सकीं, दिल के अंधेरे पातक?


कुछ जख्म ऐसे, जो जुबान से नहीं बयां होते,

फुसफुसाहटों की जंजीरों में बंद, गहरे गहरे छुपे होते।

बोलती ज़हर भरी बातें, जो भीतर धीरे-धीरे घुलती रहीं,

छुपा-छुपा कर वे मेरे दिल को चीरती रहीं।


फिर आई वो काली रातें, बोतलों में छुपे जहरीले सपने,

लाल रंग की लहरों में डूबे, जो बुझा न पाईं पीड़ा के अंगारे।

हर घूँट एक दुआ थी, गहराई में छुपा हुआ दर्द,

कि ये भूले-बिसरे भूत मुझे आज़ाद कर दें, इस मन के सफर।


पर जब ठहराव का समय आया, सचाई का साया दूर हो गया,

मैं रह गया अकेला, परछाईयों के बीच, खालीपन से घिरा हुआ।


फिर भी, कभी-कभी ये आँखें फिर से जल उठती हैं,

अग्नि की वह चमक जो छुपी नहीं जा सकती, जो छुपती नहीं।

चाँद के बिना अंधेरे में भी जलती हुई मशाल,

जो भीतर की वीरानी में उजाला करती है, सदा की तरह।


जब दया की परतें उतरती हैं, और नकाब टूटते हैं,

जब इंसानियत अपने आखिरी साँस लेती है,

मेरी नज़र बन जाती है एक शिकारी की, जो सत्य को खोजती है,

एक तेज़ आग जो हर झूठ और छल को भस्म कर दे।


कभी सपनों में ये आँखें मुझसे बातें करती हैं,

डर और शंका के साए में छिपी मेरी सच्चाई दिखाती हैं।

एक भटकती हुई छाया, जो मेरी नींद तक में दस्तक देती है,

जो मेरे भीतर के अंधकार को प्रकट करती है, खुलकर बताती है।


लाल आँखे जो देखती हैं मेरे सबसे गहरे दर्द को,

उन घावों को जो मैं छुपाता हूँ, जो मेरे चेहरे पर झलकते हैं।

वो अंधकार जो मेरी आत्मा में अभी भी विद्यमान है,

वो अनकही पीड़ा, जिसे मैं स्वयं भी पूरी तरह समझ नहीं पाता हूँ।


मेरे भीतर की ये आग बुझती नहीं,

हर याद, हर घाव मेरे दिल को चुभता है।

हर झूठी हंसी, हर टूटे हुए वादे का भार,

मेरे अंदर एक तूफ़ान बनकर उठा है, मेरे सपनों को तहस-नहस कर गया है।


मेरे अकेलेपन के उस सन्नाटे में,

जहाँ उम्मीदें धीरे-धीरे मरती हैं,

जहाँ हर खुशी का रंग फीका पड़ जाता है,

मैंने सीखा है कैसे खुद से लड़ना, कैसे खुद को संभालना।


ये आँखें जो देखती हैं परछाइयों को,

वे समझती हैं इस दर्द को जो शब्दों में कह नहीं पाते।

वे जानती हैं, ये जख्म वक्त के साथ भी मिटते नहीं,

पर हर चोट के साथ, मैं थोड़ा और मजबूत होता गया।


और आज भी, जब ये आँखे जल उठती हैं,

मैं जानता हूँ कि ये आग मेरे अस्तित्व की पहचान है।

ये मेरी लड़ाई है, मेरा संघर्ष है,

जो मुझे हर दिन उठने और लड़ने की ताकत देती है।


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