मैं यहाँ हूँ

 

उन जगहों पर, जहाँ कभी मेरे दिल की धड़कनें संगीत बनती थीं,  

अब वह एक सूखा झरना है, शुष्क और स्थिर,  

जहाँ हर आवाज़, हर ख्याल, सूखे पत्थर की तरह ठहरे हुए हैं।  


मेरे अंदर ज्वालामुखी था, आग का सागर,  

जो कभी फूटने की चाह में धधकता रहा,  

उस तीव्र उत्कंठा से, जिसमें मेरी सारी दुनिया बसती थी।  

हर एक चिंगारी वादा था, हर लपट एक सपना,  

जो कभी पूरी न हुई, बस स्मृति बनकर रह गई।  


मेरी आत्मा में थी असीम क्षमता,  

एक ब्रह्मांड जैसी अनंत, साकार होने को तैयार,  

सपनों की नगरी, आकारहीन लेकिन चमकती,  

जो कभी साकार न हो सकी, केवल कल्पना की उड़ान।  

वह क्षितिज की ओर बढ़ती, पर कभी छू न सकी,  

मृत्यु की सीमा से परे, एक मोहक सपना।  


मैंने कई योजनाएँ देखीं,  

जैसे अनगिनत सितारे,  

मगर वे धूल बन गईं, धुंधली स्मृतियों की तरह।  

मेरी इच्छाएँ अनंत थीं, आग जैसी,  

जो मेरी आत्मा को झुलसाती रही, ऊँचाइयों की ओर।  

वे अनसुलझी पहेलियाँ, अनसुने रास्ते,  

जिसमें मेरी यात्रा कभी पूरी न हुई।  


मैंने चाहा था, खुशियों का समुंदर,  

विजयों का खज़ाना,  

मगर वह सब मृगतृष्णा निकला—  

एक राजा, बिना राज्य का,  

बंजर सिंहासन पर बैठा,  

खोए हुए ख्वाबों का अकेला सिपाही।  


हर प्रार्थना, हर इच्छा,  

बंदरगाह की तलाश में था,  

मगर वह भी सूखी नदी जैसी,  

उसे कोई सुनने वाला नहीं था,  

सिर्फ सन्नाटा, विशाल और उदासीन,  

जो गूंजता रहता, हर तरफ़, अनसुना।  


मुझे कोई साथी नहीं मिला,  

कोई हाथ नहीं, जो थाम ले,  

कोई फुसफुसाहट नहीं, कोई कहानी नहीं,  

सिर्फ एक अकेलापन—  

सूरज की तपिश और चाँद की खामोशी में।  


जुड़ाव की लालसा,  

एक अनवरत टीस की तरह,  

एक ऐसा दिल, जो कभी टूट न सका—  

अदृश्य दीवारें, अनकही, स्व-लादी हुई।  

खामोशी में लहूलुहान,  

मैं एक अनंत ज्वाला था—  


गंगा के प्रवाह की तरह,  

वाराणसी की घाटियों में,  

जहाँ आत्माएँ स्वतंत्र होती हैं,  

मुक्ति की ओर बढ़ती हैं,  

मगर मेरी आत्मा भी जली,  

भयभीत और इच्छाओं से भरी।  


अब वह आग शांत हो चुकी है,  

अंगारे बुझ चुके हैं,  

केवल राख बची है,  

और वह धुआं—  

जो धीरे-धीरे ओझल हो जाता है,  

पीछे छोड़ जाता है,  

एक सन्नाटा, कठोर और सच्चा।  


यह सन्नाटा एक प्रतिबिंब है,  

उस अंत की, जो हर ज्वाला को बुझाने के बाद आता है,  

वह शांति, जिसमें सब कुछ मुरझा जाता है,  

और केवल स्मृतियाँ रह जाती हैं,  

जैसे सूखे पेड़ की शाखाएँ,  

जो अपने अंत की ओर बढ़ रही हैं,  

खामोशी की चादर तले।  


यहाँ, मैं विश्राम करता हूँ—  

एक ऐसे स्थान पर,  

जहाँ मेरे संघर्ष की आग बुझ चुकी है,  

और अब केवल एक ठंडी शांति है,  

जो समय के साथ घुल-मिल गई है।  

यह वह स्थान है,  

जहाँ मैं अपने भीतर की गहराइयों में खोया हूँ,  

एक अंतहीन यात्रा की समाप्ति पर।

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