खामोशी का जख्म

 

सच में,

सबसे क्रूर जख्म वो नहीं होता जिसमें खून बहता है,

बल्कि वो होता है—

जो धीरे-धीरे, खामोशी से,

दिल के किसी कोने में उग आता है।  


यह जख्म,

एक गर्माहट से शुरू होता है—

जैसे पहली बार कोई नज़र मिलती है,

जो कहती है, "तुम मेरे हो,"

और फिर उसका स्पर्श—

जो फुसफुसाता है, "मैं कभी नहीं जाऊँगा।"  


हर दिल की धड़कन में एक वादा बंधा होता है—

"तुम मेरे लिए सब कुछ हो,"

जैसे शब्दों का कोई अनमोल खजाना,

जो सांसों के साथ बहता है।  


तुम उस आवाज़ की गूंज में अपना संसार बसाते हो,

उसी में साँस लेते हो,

जैसे यही वो हवा है,

जिसे तुम्हें हर हाल में ढूंढना था।  


लेकिन फिर—

वे दूर हो जाते हैं,

बिना तूफान के,

बिना चीख के,

सिर्फ़ खामोशी से—

जैसे कोई परछाई धीरे-धीरे फैलती जाती है,

और तुम्हारी दुनिया में सन्नाटा छा जाता है।  


तुम पहुँचते हो,

वे अचानक गायब हो जाते हैं,

और तुम्हें महसूस होता है—

जैसे कोई भारी बोझ टूट गया हो।

तुम घबराते हो,

पर वे फिर लौट आते हैं—

"मैं कभी नहीं गया,"

उनकी बातों में फिर वही मासूमियत,

और तुम्हारे सीने में फिर उगता है सूरज।  


तुम उनके लिए खिलते हो—

बार-बार—

यह मानते हुए कि यही है सच्चा प्यार।

लेकिन हर बार,

जब वे चले जाते हैं—

तुम्हारा कोई हिस्सा वापस नहीं आता,

वह शेष, वह खामोशी,

वह खालीपन—

जो तुम्हें और भी बेआवाज़ कर देता है।  


तुम खुद को खोजने लगते हो—

उनके प्यार के खंडहरों में—

जहां यादें झरने जैसी बहती हैं,

और हर पल तुम्हें चीरकर रख देती हैं।  


जब तक एक दिन,

तुम चीख नहींते,

उनके झूठ पर नहीं रोते,

तब तक—

तुम बस... जीते हो—

खामोश, वीरान, और अनदेखे।  


सच में,

इसी तरह कोई मरता है—

शरीर से नहीं,

बल्कि आत्मा से।  


यह दर्द, यह विरह,

जो हर सांस के साथ गहरा होता जाता है,

वही तुम्हारी कहानी बन जाती है—

एक अधूरा प्रेम,

एक अनकही पीड़ा,

जो कभी नहीं मिटती।  

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