क्षणभंगुरता का वरदान
ठंडी हवा फुसफुसाए वृक्षों में छाया,
मन में एक पीड़ा है, मूक अभिलाषा।
जीवन एक डोर है नाजुक अत्यंत,
अंधकार में टूटे उड़ती पतंग।
विशाल शून्य गहरा आत्मा में समाया,
छाया सन्नाटे में भय का साया।
भविष्य अनजान है, छिपा हुआ घोर,
प्राचीन डर है यह, मन में जो उभोर।
तो हम मुँह मोड़ते, ज्ञात से परे,
बीज बोते हैं हम, स्वप्नों के घेरे।
दूर से आती फुसफुसाहट सुनाई,
कथा गढ़ती शक्ति का गहरा सलाई।
मन एक चित्रशाला है निराशा,
जहाँ बनता है शरण सुखद आशा।
सपनों में मिलता है छाया हाथ,
शांत करे मन का विक्षिप्त साथ।
क्या भय से निकलकर अग्नि जल सके,
अंधकार की रात्रि को दीप जल सके?
क्या जीवन की नाजुकता हम समझें,
साथ बाँधकर नया पथ हम चुनें?
अज्ञात भय के आलिंगन में जागे,
नई चेतना का दीपक हम लगाए।
न रेत पर निर्मित कोई स्वप्न हो,
जीवित मनुष्यता का स्पर्श जो सो।
हँसी, आँसू, और परिश्रम मिलके,
सूरज के नीचे अर्थ हम देखें।
क्षणभंगुरता अब वरदान हो,
प्रेम से जीवन धन्य धन्य हो।
अंत के भय से प्रेरणा हमें,
*ऐसा संसार रचना सहे।
हवा फुसफुसाए, छाँव गिरे फिर भी,
समर्पित मन से करें हम सभी।
साँसों के संग हमारा जीवन गाए,
मृत्यु से भी गहरा ज्ञान पाए।
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